हमारे श्रीगुरुकी सर्वज्ञतासे सम्बन्धित कुछ और प्रसंग एवं अनुभूतियां


गुरु संस्मरण
गुरु ईश्वरके प्रतिनिधि होते हैं अतः ईश्वर समान उनमें सर्वज्ञता रुपी गुण विद्यमान होता है इस सम्बन्धमें शिष्यको गुरु उसकी भाव अनुरूप अनुभूति देते हैं

१. सूक्ष्मसे की गई प्रार्थना श्रीगुरुने सुन ली :  सम्पूर्ण भारतके सनातन संस्थाके प्रमुख प्रसारसेवकोंकी बैठक, परम पूज्य गुरुदेव ख्रिस्र्ताब्द १९९९ से लिया करते थे, जिसमें वे उनको साधनाके योग्य दृष्टिकोण दिया करते थे । हमें उस बैठकका वृत्त अथवा सार, बैठकके पश्चात् हम जिस केन्द्रमें सेवा करते थे, वहां प्राप्त हो जाया करता था । उस बैठकमें, श्रीगुरु, अध्यात्मिक दृष्टिकोणके साथ ही सभी प्रसारसेवकोंकी सेवाके मध्य होनेवाली चूकें एवं उनके स्वभाव-दोष भी बताया करते थे । मुझे इस बातकी अत्यन्त ग्लानि हुआ करती थी कि मेरी चूक श्रीगुरु नहीं बताते हैं और इस कारण मुझे लगता था कि मेरी साधनामें शीघ्र प्रगति नहीं होगी । जनवरी २००३ से मैं दिल्लीमें धर्मप्रसारकी सेवा किया करती थी और प्रतिदिन परम पूज्य गुरुदेवके चित्रसे मेरी चूक बतानेकी विनती किया करती थी । ख्रिस्ताब्द २००३ में सनातन संस्थाके साधकोंके आन्तरिक शुद्धिकरणका प्रथम चरण आरम्भ हुआ और सभी प्रमुख प्रसारसेवकोंकी चूकें सार्वजनिक कर बताई जाने लगी । मैं अत्यन्त निश्चिन्त थी । मैं सोच रही थी “मैं तो मात्र एक ‘केन्द्रसेविका’ हूं; अतः मेरे लिए यह प्रक्रिया नहीं है और एक दिवस जब संगणकीय संपत्रद्वारा (ईमेल) भेजे गए एक प्रमुख प्रसारसेवककी चूक मैंने पढी, तो मैं सन्न रह गई; क्योंकि वैसी ही चूकें मुझसे भी हो रही थी, ऐसा मुझे भान हुआ । मुझे आत्म-ग्लानि होने लगी और मेरेद्वारा जाने-अनजाने मेरे स्वभाव-दोषोंके कारण हुई चूकोंके लिए, मैंने उसी क्षण कठोर प्रायश्चित भी ले लिया और मेरा प्रायश्चित सात दिनका था । अभी दो दिन ही हुए थे कि संगणकीय संपत्रद्वारा (ईमेल) मेरी भी चूकें आनी आरम्भ हो गईं । मेरेद्वारा हुई चूकोंकी ग्लानि तो मुझे थी ही; परन्तु मेरे सर्वज्ञ गुरुको मेरी प्रार्थनाका ज्ञान हो गया, यह सोच आनन्द भी होने लगा और उसके पश्चात् वे अगले चार वर्ष तक अर्थात् जब तक मैं सनातनमें साधनारत रही मुझे मेरे श्रीगुरु मात्र मेरी चूकें ही सभी साधकोंके माध्यमसे बताते रहे !

ख्रिस्ताब्द २००४में एक बार एक युवा विद्यार्थी साधिकने मुझे बताया कि श्रीगुरु, उन्हें बुलाकर मेरी चूकें बतानेके लिए प्रोत्साहित कर रहे थे । जब उस साधिकने सहजतासे कहा कि तनुजा दीदीकी चूकें ध्यानमें नहीं आ रही हैं तो उन्होंने उससे कहा कि ध्यानसे सोचो और बैठकर, ढूंढकर मुझे लिखकर दो । उसकी यह बातें सुनकर मन आनन्दित हो गया; क्योंकि मुझे लगा कि उनकी दृष्टि मुझ जैसी एक तुच्छ साधकपर भी है एवं श्रीगुरुके प्रति मेरी श्रद्धा और बढ गई ।

एक विशेष बात इस सन्दर्भमें बताना चाहुंगी कि उन्हें ज्ञात था कि यदि वे मेरी चूक बताएंगे तो मैं उसे सहजतासे स्वीकार कर लूंगी; अतः उन्होंने मेरी चूक स्वयं नहीं बताई और मेरे लिए अन्य साधकोंसे विशेषकर जिनका आध्यात्मिक स्तर मुझसे न्यून था तथा उनसे चूकें सुनना मेरे लिए अत्यन्त कठिन था, उनसे मेरी चूकें बतलाईं । इससे आरम्भमें मुझसे चूकें स्वीकार नहीं होती थीं तो मैंने उनसे प्रार्थना की, “आप इस प्रकार अन्य साधकोंसे ही मेरी चूकें क्यों बताते हैं ? आप मुझे स्वयं ही मेरी चूकें क्यों नहीं बता देते ?” तो उन्होंने सूक्ष्मसे कहा कि यदि आप इन सभी साधकोंसे चूक सुनकर अपनेमें सुधार लाएंगी, तो आप मेरे स्वरुपके दर्शन प्रत्येक जीवमें कर पाएंगी और आपकी साधनामें द्वैतसे अद्वैतकी ओर प्रवास आरम्भ हो जाएगा और आप साधनाके अगले चरणमें चले जाएंगी ।”
२. सर्वज्ञ श्रीगुरुद्वारा दिए गए ग्रन्थरुपी प्रसादका अनेक वर्षों पश्चात् भावार्थ समझमें आया :
बाल्यकालसे ही ज्ञान प्राप्तिमें विशेष रुचि होनेके कारण ग्रन्थोंसे मेरा विशेष लगाव था या यूं कहें मेरी मुख्य अभिरुचि सदैव यही रही । मई १९९७ से अप्रैल २००८ के कालखण्डमें मेरे श्रीगुरुने मुझे दो बार विशेष प्रसाद दिया और वह ग्रन्थके रूपमें था और दोनों ही ग्रन्थ विशेष कारणोंसे दिए थे, यह भान मुझे कुछ काल उपरान्त समझमें आया एवं इससे श्रीगुरुकी सर्वज्ञताका बोध हुआ । सितम्बर १९९९ में मैं श्रीगुरुके दर्शन एवं सत्संग हेतु कुछ दिनोंके लिए उत्तर भारतसे गोवा आश्रम गई थी । उसी मध्य एक दिवस उन्होंने मेरे हाथमें उनकेद्वारा लिखित दो ग्रन्थ दिए, एक था ‘अध्यात्म’ और दूसरा ‘शिव’, उन्होंने कहा “यह दोनों ग्रन्थ विशेष हैं, यह दोनों ग्रन्थोंकी प्रथम प्रति है और मैंने उन्हें पूज्य भक्तराज महाराजकी समाधिपर रखे थे, इस कारण इसमें विशेष शक्ति भी है; अमरीकासे जो साधिका आई है, उन्हें एक ग्रन्थ दे दें और दूसरा आप रख लें ।” मुझे अध्यात्ममें विशेष रुचि थी एवं सगुण उपासनामें कोई विशेष रुचि नहीं थी; अतः मैंने ‘अध्यात्म’ ग्रन्थ रख लिया और दूसरा ग्रन्थ उनकी आज्ञा अनुसार अमरीकासे आईं साधिकाको दे दिया । मेरे सर्वज्ञ गुरुको ज्ञात हो गया कि उन्होंने मेरे लिए जो ग्रन्थ दिया था वह मेरे पास नहीं है; अगले दिवस उन्होंने मुझसे पूछा “आपने कौनसा ग्रन्थ अपने पास रखा ?”, मैंने कहा, “अध्यात्म” उन्होंने कहा “उस साधिकासे पूछा या नहीं कि उसे कौनसे ग्रन्थमें रुचि है; क्योंकि वे आपसे छोटी हैं ।” मैं अपने श्रीगुरुका आशय समझ गई कि मुझे ‘शिव’ ग्रन्थ लेना चाहिए था ।” उनके कक्षसे निकलनेके पश्चात् मैं उस साधिकाके पास गई एवं उन्हें श्रीगुरुकी सारी बातें बता दी, वे कहने लगीं “दीदी, मुझे अध्यात्म चाहिए था; परन्तु आपने मुझे शिव थमाया तो मैंने सोचा, सम्भवत: यही ईश्वरकी इच्छा है  !” मैंने उन्हें ‘अध्यात्म’ ग्रन्थ दे दिया और शिव ग्रन्थ ले लिया । भविष्यमें अनिष्ट शक्तियोंके निवार्णार्थ मुझे समाजमें जागरूकता फैलानी होगी एवं शिव तत्त्वके माध्यमसे ही भविष्यमें मैं धर्मकार्य करुंगी, यह मेरे द्रष्टा श्रीगुरुसे अधिक अच्छेसे और कौन जान सकता था; अतः उन्होंने उसी अनुरूप मुझे वह दिव्य प्रसाद दिए थे । उसी मध्य तीन चार दिवस पश्चात् उनके एक और अंग्रेजी ग्रन्थका विमोचन हुआ उनके ही हाथों हुआ । वहां कुछ साधक बैठे थे, उन्होंने मुझे बुलाया और वह ग्रन्थ मेरे हाथमें दे दिया । मेरी तो आनन्दके कारण नेत्र छलक गईं; परन्तु इस ग्रन्थको देनेके पीछे भी एक गूढ भावार्थ तब समझमें आया जब मैं ख्रिस्ताब्द २०१० में मैं ‘उपासना’के उद्देश्य लिखने लगी अर्थात् और उसमें मुझसे सहज ही लिखा गया कि उपासनाका एक उद्देश्य वर्णाश्रम व्यवस्थाकी पुनर्स्थापना होगी जो भारतीय संस्कृतिकी नींव है । वे दोनों ग्रन्थ मेरे लिए इस संसारकी सर्वाधिक प्रिय वस्तु हैं; वैसे भी एक गुरुभक्तके लिए गुरुप्रसादसे अधिक श्रेष्ठ वस्तु और हो भी क्या सकती है इस ब्रह्माण्डमें !
३. जब श्रीगुरुने स्वयं ही मेरे ध्येयकी कर दी पुष्टि : ख्रिस्ताब्द १९९८ में मैं मुम्बईमें सनातन संस्थास्वर आयोजित एक सत्संगमें बैठी थी ।  संस्थाके एक ज्येष्ठ साधक वह सत्संग ले रहे थे । वह सत्संग मराठीमें हो रहा था और उस समय मुझे मराठी ठीकसे समझमें नहीं आती थी, मैं अपने श्रीगुरुद्वारा बताए गए अध्यात्मशास्त्रके सिद्धान्त अनुसार सत्संगमें शब्दातीत चैतन्य लेने बैठी थी । उनका कहना है कि सत्संगमें शब्दजन्य ज्ञानका महत्त्व मात्र २% होता है और शब्दातीत चैतन्यका महत्त्व ९८% होता है, मैं उसी शब्दातीत सत्संगका आनन्द लेने हेतु बैठी थी । इस प्रकारका दृष्टिकोण रखकर सत्संगमें उपस्थित होनेके कारण कहें या मेरे सद्गुरुकी कृपा कहें मुझे कभी भी भाषा न समझमें आनेपर भी सत्संगमें नीरसता नहीं हुई । उस दिवसके सत्संगमें मुझे एक बात समझमें आई कि साधक बनना उतना सरल नहीं । जो प्रतिदिन आठसे दस घण्टेका नामजप करता है, जो प्रतिदिन ईश्वरीय-कार्य, धर्म-कार्य या सन्त-कार्यमें निष्काम भावसे शरीरके माध्यमसे प्रतिदिन तीन-चार घण्टे सेवा करता है और जो प्रति मास ५ से १०% धनका त्याग करता है, खरे अर्थमें वह साधक कहलाने योग्य होता है । मैंने निश्चय कर लिया कि मेरा सर्वप्रथम ध्येय साधक बनाना है और उस हेतु तन, मन और धन अर्पण कर, निरन्तरतासे साधना करनी है । मैंने मनमें दो वर्षोंका ध्येय रख यह संकल्प लिया कि दो वर्षोंमें मुझे साधक बनना है । यह बात जनवरी १९९८ की है । इस ध्येयका निर्धारणकर, साधना आरम्भ करनेके पश्चात् मेरी साधनामें अडचनोंकी झडी लग गई; परन्तु अपने ध्येयको पाने हेतु उस पथपर अग्रसर हो, मैंने सर्व प्रयास आरम्भ कर दिए । इसे गुरुकृपा ही कहें कि जैसे-जैसे अडचनें बढती गईं, मेरे ध्येयको पानेकी दृढता और प्रयास भी बढते गए । ख्रिस्ताब्द २००० के जनवरी मासमें मेरे माता-पिताका वार्षिक श्राद्ध करना था, मुझे इस सन्दर्भमें क्या करना है, मुझे इसका ज्ञान नहीं था; अतः मैंने एक ज्येष्ठ साधकसे उस सन्दर्भमें क्या करना यह पूछा, उन्होंने यह विषय श्रीगुरुसे पूछा, तो श्रीगुरुने उनसे कहा, “तनुजा तो ‘साधक’ है उसे कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं, वह वर्तमान समयमें जो धर्मप्रसारकी सेवा कर रही है, मात्र उसमें निरन्तरता बनाए रखे ।” उस समयमें धनबादमें (झारखण्ड) धर्मप्रसारकी सेवा कर रही थी । अपने श्रीगुरुके श्रीमुखसे मेरे लिए ‘साधक’ यह सम्बोधन सुन, मुझे मेरा संकल्प ध्यानमें आ गया जो सम्भवतः साधनामें मग्न होनेके कारण मैं भूल गई थी; परन्तु मेरे सर्वज्ञ श्रीगुरु नहीं भूले थे । मैंने जब भी कोई ध्येय मनमें रखा, मेरे श्रीगुरुने सदैव उस ध्येय प्राप्तिकी समयसे पूर्व ही पुष्टि की, यह उनकी विशेष कृपा रही है जबकि मैंने अपने ध्येयको सदैव ही अपने मनमें ही रखती हूं और उसे किसीको भी बताती नहीं हूं किन्तु मेरे सर्वज्ञ सद्गुरु सदैव ही मेरे मनकी भाषा पढ लेते हैं । इससे मुझे समझमें आया कि ध्येय भी वही देते हैं और पूर्ण भी वही करवाते हैं; उनकी लीलाकी प्रचीति लेने हेतु, हम तो मात्र निमित्त होते हैं ! यहां एक और तथ्य स्पष्ट करना चाहुंगी कि श्रीगुरुने ‘शिष्य’ ग्रन्थमें लिखा है कि जो शिष्य अपना सर्वस्व श्रीगुरुके चरणोंमें समर्पित कर उनके या उनके कार्यमें लीन रहता है उस शिष्यको सामान्य मनुष्य समान चार ऋण नहीं देने होते हैं और उन्होंने अपने उपर्युक्त सुवचनसे इस शास्त्रवचनकी भी पुष्टि कर दी ।
४. खरे ज्ञान हेतु सर्वस्व अर्पण करना होता है : किसी संस्थाके एक अध्यात्मविद् अध्यात्म सिखानेके लिए पैसे लेते थे, मुझे लगा ऐसा नहीं होना चाहिए और अध्यात्मका ज्ञान निःशुल्क दिया जाना चाहिए । जब इस विचारके आनेके चार मास पश्चात् दिसम्बर २००० मैं गोवा आश्रम अपने श्रीगुरुके दर्शन एवं सत्संग हेतु गई वे सहज ही बोल उठे “देखो अमुक अध्यात्मविद् (उसीका नाम लिया जिसके सम्बन्धमें मेरे मनमें विचार आया था) तो मात्र पैसे लेकर ज्ञान देते हैं; परन्तु खरे सन्त तो सब कुछ ले लेते हैं तन, मन, धन, अहम्, सब कुछ और तब आत्मसाक्षात्कारका बोध करवाते हैं ! मेरा मन, अपने गुरुकी इस सर्वज्ञता और उनके सिखानेकी इस पद्धतिपर भाव विभोर हो उठा !
५. माता समान मेरी शरीरप्रकृतिका भान रखनेवाले मेरे सर्वज्ञ श्रीगुरु : अप्रैल २००४ में गोवा आश्रममें पाकशालामें (रसोईघरमें) सेवा करनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ,  ख्रिस्ताब्द २००३ के अन्तमें हमारी अहम् निर्मूलन प्रक्रिया आरम्भ हुई और प्रसारके मध्य हमसे जो चूक हुई थी उस कारण हमसे ब्राह्मण वर्ण ( समाजको साधना बताना) इस साधनासे निवृत्त कर शूद्र वर्णकी (शारीरिक सेवा) सेवा करनेका आदेश प्राप्त हुआ था, जिसके अन्तर्गत हमें पाकशालामें सेवा करनी थी । इससे पूर्व मेरी तीव्र इच्छा थी कि मैं श्रीगुरुकी रसोईमें सेवा करूं जिससे कभी उन्हें और उनके साधकोंकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त हो सके; परन्तु प्रसारकी सेवाका उत्तरदायित्त्व रहनेके कारण यदि आश्रममें जाती भी थी तो पाकशालाकी सेवाका सौभाग्य नहीं मिल पाता था और जब हमें दण्डके रूपमें उस विभागकी सेवा मिली तो ऐसा लगा कि जैसे अंधा क्या चाहे, दो आंखें ! मैं अत्यधिक आनन्दसे वह सेवा कर रही थी । यद्यपि बाल्यकालसे अनिष्ट शक्तियोंके कष्ट झेलते-झेलते शारीरिक क्षमता अल्प हो गई है और शरीरकी प्रकृति भी थोडी कोमल है, साथ ही सदैव थोडी अस्वस्थता रहनेके कारण माता-पिताने भी शारीरिक श्रमवाले कार्य कभी अधिक नहीं कराए तथापि मेरी प्रवृत्ति कभी आलसी नहीं रही ।
आश्रममें १२० साधकोंके लिए प्रतिदिन प्रसाद(भोजन) बनता था; अतः सेवा थोडी कठिन थी, साथ ही अनिष्ट शक्तियोंके कष्टके साथ ही सूक्ष्म युद्धकी तीव्रता बढ जानेके कारण अकस्मात् शारीरिक क्षमता भी घटने लगी थी, तब भी चूंकि सेवा मनके अनुकूल थी; अतः उसे आनन्दपूर्वक करती थी । हमारा अहम् निर्मूलन चल रहा था; अतः आश्रमके कोई साधक हमारी किसी भी उत्कृष्ट कृतिपर प्रशंसा नहीं करें, ऐसा आश्रम व्यवस्थापनको श्रीगुरुसे निर्देश प्राप्त थे । एक दिन एक साधकने आकर मुझसे कहा “आज परम पूज्य गुरुदेव कह रहे थे कि तनुजा कैसी है ?, देखना ! उसका ध्यान रखना ! उसे इतने श्रमवाली सेवा करनेका अभ्यास (आदत) नहीं ।” यद्यपि उस साधकको मेरी अहं-निर्मूलनकी प्रक्रियाको जानते हुए ऐसा नहीं कहना चाहिए था; परन्तु सम्भवतः वह बात मुझ तक मेरे श्रीगुरुको पहुंचानी थी; अतः उस साधकके मुखसे निकल गई, यह सुन मेरा मन और भी आनन्दित हो गया; क्योंकि मेरी शारीरिक बनावट और आनन्दी मुख (चेहरा) देखकर कोई भी नहीं कह सकता था कि मेरे लिए वह सेवा करना अत्यधिक कठिन हो रहा था और मैं कई बार अंग्रेजी वेदनानाशक वटी(गोली) लेकर सेवा करती थी, जबकि साधारणतः मुझे अंग्रेजी औषधि लेना रुचिकर नहीं; परन्तु मैं अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर, उनकी आज्ञाका पालन करना चाहती थी और मेरा अन्तर्मन कहता था कि मुझे यह सेवा अत्यल्प समयके लिए मिली है; अतः उसे करनेसे पीछे नहीं हटना है और वैसा ही हुआ । दो वर्षों पश्चात् मेरे स्वास्थ्यमें और गिरावट होनेके कारण, मैं चाहकर भी वह सेवा करनेमें असमर्थ थी । आज यह सोच मन आनन्दित होता है कि दण्ड देनेवाले सद्गुरुका मन कितना कोमल, निर्मल और माता समान होता है । उनकेद्वारा एक साधकको मेरा ध्यान रखनेके लिए कहना, मात्र इस प्रसंगने मुझे उस सेवा करनेकी और भी स्फूर्ति दी ।

इस संदर्भमें एक और प्रसंग है । सितम्बर १९९९ में चार दिनोंके लिए गोवा आश्रम गई थी, उस समय ही साधकोंके लिए स्वसंरक्षण वर्ग आरम्भ किए गए थे और राष्ट्रीय स्तरके स्व-संरक्षण प्रशिक्षणके प्रमुखसेवक भी गोवा आए थे । एक दिन सन्ध्या समय श्रीगुरुने मुझसे कहा “आप भी लाठी-काठी सीख लें, हमें अपना रक्षण करना आना ही चाहिए” और उन्होंने उसी क्षण स्वसंरक्षण वर्गके प्रमुखसेवकको बुला कर मुझे लाठी-काठी सिखानेका आदेश दिया । मैं दो दिनों पश्चात् पुनः उत्तर भारत जानेवाली थी; अतः दो दिनोंमें कितना सीख पाउंगी ?, यह मुझे और प्रमुख प्रशिक्षणसेवकको भी ज्ञात था; परन्तु हम दोनोंने गुरु आज्ञा मान, लाठी-काठी, श्रीगुरु जिस कक्षमें थे, उसकी बालकनीमें ही सीखनी आरम्भ की । अन्दर कक्षमें वे ग्रन्थ लेखन कर रहे थे और पर्दा लगा हुआ था, मैंने सात-आठ बार ही लाठी घुमाई होगी और मेरे कन्धोंमें तीव्र वेदना होने लगी और लाठी भारी होनेके कारण मैं ठीकसे घुमा भी नहीं पा रही थी, तभी श्रीगुरु आए और परदे टांगनेवाली लाठी लाकर मेरे समक्ष रख दी और कहने लगे “पूर्वमें हलकी लाठीसे, लाठी घुमानेकी कला सीख लें, तत्पश्चात् भारी लाठीसे अभ्यास करें ।” हमारे ज्येष्ठ साधकने मेरी ओर देखा तो उन्हें सम्भवत: उनकी चूकका भान हुआ और श्रीगुरुके जानेके पश्चात् उन्होंने मुझसे पूछा “क्या  आपको कष्ट हो रहा था क्या ?” मैंने कहा, “हां, दोनों कन्धोंमें वेदना हो रही है ।”, वे बोले, “देखिए ! हम आपको सिखा रहे हैं और आपके कष्ट हमें नहीं समझमें आए और उनको कक्षके अन्दर आपके कष्टका भान हो गया ।”
गुरु, शिष्यको कदापि अपरिपूर्ण नहीं छोडते, इस सिद्धान्त अनुसार उन्होंने शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूपसे मुझे सक्षम बनाने हेतु सर्व प्रशिक्षण भी दिए । अपने श्रीगुरुके मापदण्डपर खरे उतरने हेतु मैंने भी आगे चलकर लाठी-काठी, कराटे सब कुछ सीखनेके यथासम्भव प्रयास किये और नियमित अभ्यास भी करने लगी । – तनुजा ठाकुर



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