गुरु संस्मरण – मेरे द्रष्टापनयुक्त सद्गुरु


ख्रिस्ताब्द २००० से ही जहां भी मैं प्रसार करती थी वहां परम पूज्य गुरुदेव डॉ. आठवले जिनकी छत्रछायामें मैं साधना करती थी, वे मेरे लिए संगणक या तो भेज दिया करते थे या उसकी व्यवस्था केन्द्रमें हो जाया करती थी । उन्होंने मुझसे एक-दो बार पूछा भी कि मुझे संगणकपर सेवा करना आता है या नहीं; परन्तु मैं उनके इस प्रकार पूछनेका भावार्थ समझ नहीं पाई । धर्मप्रसारकी व्यस्तताके कारण मैं संगणकीय सेवा हेतु बैठ ही नहीं पाती थी और मुझे संगणक चलाना भी नहीं आता था तथा आज मुझे ज्ञात होता है कि जैसे कोई शक्ति मुझे उसे सीखनेसे दूर रखनेका प्रयास कर रही थी । एक-दो बार सीखनेका भी प्रयास किया; परन्तु कुछ न कुछ व्यवधान आ जाता था और इस प्रकार चार वर्ष निकल गए ।
     विद्यालय एवं महाविद्यालयमें मेरी पढाईका माध्यम अंग्रेजी रहा था । हिन्दी भाषिक होनेके कारण हिन्दी भाषाका सामान्य ज्ञान था; परन्तु पाठ्यक्रममें हिन्दी एक ही विषय हुआ करता था; फलस्वरूप हिन्दीमें लेखको हाथसे लिखना मेरे लिए कठिन प्रतीत होता था ।
     मुझे आज भी ख्रिस्ताब्द २००४ का वह दिवस ध्यान है जब हमारे एक ज्येष्ठ साधक जो वाराणसी आश्रममें दो माहमें एक बार आया करते थे, उन्होंने मुझे झिडकते हुए कहा था कि पिछले चार महीनोंसे मैं आपको बार-बार कह रहा हूं कि आप संगणक सीखें; परन्तु आप इस तथ्यको गम्भीरतासे क्यों नहीं लेती हैं ? अगली बार दो महीने पश्चात जब मैं आऊं तो आपको संगणकपर टंकन (टाइपिंग) करना एवं प्रथम चरणके सभी तथ्योंका अभ्यास हो जाना चाहिए । उनके इस आदेशको सुनकर लगा जैसे मेरे श्रीगुरु ही मुझे ऐसा बोल रहे हों एवं मैं अपनी इस चूक हेतु लज्जित थी; क्योंकि वे मुझे चार माहसे बार-बार संगणक सीखने हेतु कह रहे थे और उस दिशामें मुझसे जो प्रयास अपेक्षित थे वे नहीं हो रहे थे । मेरे पास उस समय वाराणसी आश्रममें सभी साधकों हेतु तीनों समयके भोजन बनानेकी सेवा थी और यह सेवा मुझे अतिप्रिय थी; अतः मैं उस सेवाको ही प्रधानता दिया करती थी । मेरे श्रीगुरुका मेरे भविष्यके लिए क्या नियोजन है ?, यह इस मूढबुद्धिको ज्ञात नहीं था । हमारे ज्येष्ठ साधकके उस आदेशके पालन हेतु मैंने संगणक सीखनेका प्रयास आरम्भ कर दिया; परन्तु मुझे अत्यधिक अडचनें आती थीं तथा मुझे भान होने लगा कि संगणक सीखना मेरे लिए एक युद्ध करने समान ही था । कभी संगणक बिगड जाता था तो कभी विद्युत आपूर्ति बाधित हो जाती  थी तो कभी मुझे अत्यधिक कष्ट होने लगता था । ऐसा लगता था कि मैं संगणकीय सेवा कभी नहीं कर पाउंगी ! किसी प्रकार मैंने संगणक चलाना सीखा और उसके पश्चात अपनी सभी अनुभूतियोंको टंकितकर परम पूज्य गुरुदेवको भेजने लगी ।
      संगणकीय सेवामें मैंने मात्र टंकलेखन और किसी प्रकार संगणकीय सम्पत्र (ईमेल) भेजना सीख ही रही थी कि मुझे परम पूज्य गुरुदेवके आदेश अनुसार मुंबई आश्रममें रहनेकी और संस्थाके हिन्दी विभागमें सेवा करनेकी सन्धि मिली, वहां कुछ माहकी सेवाके मध्य मैंने धारिकाको (फाइलको) किस प्रकार व्यवस्थित रूपसे संरक्षित करते हैं ?, भाषा संशोधन कैसे करते हैं ?, यह सब सीख ही रही थी कि मुझे उसी आश्रमके ध्वनि-चित्रीकरण विभागमें सेवा हेतु भेज दिया गया । वहां भी हमारे श्रीगुरुने मुझे वहांके साधकोंके माध्यम ध्वनिफीत एवं चित्रफीतोंकी (ऑडियो और विडियो क्लिप्स) संकलनकी (एडिटिंग) सेवा सिखाई । सब कुछ इतनी तीव्र गतिसे हो रहा था कि मुझे लगा जैसे मेरे श्रीगुरु मुझे सब कुछ शीघ्र अति शीघ्र सिखाना चाहते हैं । विशेष बात यह है कि संगणकके विभिन्न पक्ष सीखने हेतु बुद्धिकी आवश्यकता होती और ख्रिस्ताब्द २००४ से सूक्ष्म युद्धकी तीव्रता बढती चली गई तथा मेरे कष्ट भी बढने लगे एवं मेरे पास भावास्थामें रहना, यह ही मेरे कष्टोंकी तीव्रता सहन करनेका एक मात्र माध्यम था; परन्तु उस अवस्थामें बौद्धिक सेवा करना, यह एक बडी चुनौती हुआ करती थी और वह भी प्रतिदिन बौद्धिक स्तरपर कुछ नूतन सीखना, यह मेरे इतना कठिन हुआ करता था कि उसे शब्दोंमें व्यक्त करना असम्भव है ! भावास्थामें रहनेके कारण मुझसे अनेक चूकें हुआ करती थीं और ऐसा लगता था जैसे आनन्दावस्थासे निकलकर कुछ बौद्धिक सीखते समय मेरा ईश्वरसे जैसे अनुसन्धानका क्रम विभक्त हो जाता हो और इस प्रकार एक द्वंद्व सदैव चलता था कि मैं अपनी ‘बौद्धिक सेवा और भावावस्था’ दोनोंमें सामंजस्य कैसे बनाकर रखूं ? ऐसी कठिन परिस्थितिमें मेरे श्रीगुरुने मुझे संगणकमें जो सीखना आवश्यक था वह सब सिखाकर, मुझे अपनी व्यष्टि साधनापर ध्यान देनेका आदेश देकर, मुझे आश्रमसे विदा कर दिया ।
 आश्रमसे विदा होनेके एक वर्ष पश्चात मैंने ‘फेसबुक’के माध्यमसे धर्म प्रसारकी सेवा अन्तःप्रेरणासे आरम्भ की और उसमें मुझे अत्यधिक उत्साहवर्धक प्रतिसाद मिलने लगा और इस प्रकार संगणक मेरे लिए ऐसे समयमें मेरी समष्टि साधनाका माध्यम बना जब मेरी प्राणशक्ति न्यून हो जानेके कारण मैं स्थूल अर्थात शारीरिक रूपसे प्रसार करनेमें सक्षम नहीं रही । मेरे श्रीगुरु मुझे सदैव प्रसारकी सेवाके मध्य भी संगणक क्यों उपलब्ध करवाते थे ?, उन्होंने एक ज्येष्ठ साधकके माध्यमसे मुझे संगणककी भिन्न सेवा सीखने हेतु क्यों बाध्य किया ?, क्यों वे मुझे सदैव प्रसारके मध्य घटित होनेवाले सारे तथ्योंको लिखने हेतु कहते थे ?, क्यों उन्होंने मुझे ध्वनि चित्रीकरण विभाग और हिन्दी विभागमें कुछ दिवस वहां सेवा करनेकी सन्धि दी ?, क्यों मुझे सदैव सामयिक विषयोंसे अवगत रहने हेतु समाचार पत्र पढने हेतु कहते थे ?, यह सब अब स्पष्ट हो रहा है और अपने सद्गुरुके द्रष्टापनपर नतमस्तक होनेको मन करता है ! ऐसे द्रष्टा सन्तको अपने श्रीगुरुके रूपमें पाकर हम धन्य हो गए !


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