जून ३०, २०१८
हिन्दीमें न्ययालयका निर्णय चाहने वालोंको अब अंग्रेजी भाषामें लिखे निर्णयपर निर्भर नहीं रहना पडेगा । पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालयके न्ययाधीश एमएमएस बेदी और हरिपाल वर्माने प्रथम बार हिन्दीमें निर्णयकी प्रति उपलब्ध करवाकर स्पष्ट कर दिया है । अभिवक्ता मनीष वशिष्ठकी मांगपर दोनों न्यायाधीशोंकी खण्डपीठने उनको अपना निर्णय हिन्दीमें उपलब्ध करवाया है । अंग्रेजीमें उनके ६७ पृष्ठके आदेशका हिन्दी अनुवाद ११४ पृष्ठ हस्त लेखन रूपमें उपलब्ध करवाया ।
उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालयमें लगभग सभी कार्य अंग्रेजीमें होते हैं । वाद-विवाद भी अंग्रेजीमें किए जाते है और निर्णय भी अंग्रेजी भाषामें ही सुनाए और लिखे जाते हैं । ‘नारनौल बार एसोसिएशन’के पूर्व प्रधान एवं अभिवक्ता नवीन वशिष्ठने न्यायालयसे अपने विरुद्ध दिए आदेशको हिन्दीमें देनेकी मांग की थी ।
न्यायाधीश एमएमएस बेदी एवं हरिपाल वर्माकी खण्डपीठने ३१ मईको आपराधिक अवमानना प्रकरणमें नवीनको ६७ पृष्ठका निर्णय अंग्रेजीमें उपलब्ध करवाया था । वशिष्ठने खण्डपीठसे निर्णयके हिन्दी अनुवादकी मांग करते हुए कहा था कि भले ही वह अधिवक्ता हैं; लेकिन उसकी शिक्षा-दीक्षा हिन्दीमें हुई है और हिन्दी उसकी ‘मातृभाषा’ है ।
इसके अतिरिक्त भारतीय दण्ड संहिताकी धारा ३६३(२) के प्रावधानके अनुसार वह निर्णयका हिन्दी अनुवाद लेनेका अधिकारी है । वशिष्ठकी इस विनतीपर न्यायालयने उनको निर्णयका हस्तलिखित हिन्दी अनुवाद उपलब्ध करवा दिया !
न्यायालयमें हिन्दीमें आदेशकी मांग कई दिनोंतक न्यायाधीशोंके मध्य चर्चाका विषय रही । अंततः आदेश हिन्दी भाषामें उपलब्ध करवानेका निर्णय ले लिया गया । अब समस्या हिन्दीमें लिखनेको लेकर थी, ऐसेमें न्ययालयने आदेश उपलब्ध करवानेके लिए कागदपर इसे लिखकर सौंपनेका निर्णय लिया !
स्रोत : अमर उजाला
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