९५ कोटि हिन्दुओंवाले इस देशकी विडम्बना तो देखें कि आज अधिकांश हिन्दुओंकी सन्तानोंको हिन्दीके अंक भी गिनने, लिखने और पढने नहीं आते हैं ! एक दिवस मैं अपने अनुजके घर गयी थी, वहां गृहकार्य करनेवाले एक व्यक्तिको कुछ वस्तु लाने हेतु एक सूची बनाने हेतु कहा तो उसने कहा “मैं अनपढ हूं, लिख नहीं सकता ।” कुछ ही घंटों पश्चात् वह दूरभाषपर बात करते हुए किसीका सम्पर्क क्रमांक लिख रहा था तो मैंने उससे पूछा कि तुमने तो कहा था कि तुम अनपढ हो तो कागदपर क्या लिख रहे थे ? उसने कहा, “हां, मैंने मात्र दूसरी कक्षा तक ही किसी प्रकारसे पढाई की है और हमारे ग्रामके शिक्षकने हमें प्रथम अंग्रेजीके अंक लिखने सिखाये थे; अतः वह मैं १ से १० तक लिख सकता हूं और कुछ नहीं लिख सकता ।” मैंने कहा, “यह कैसे सम्भव है कि ग्रामीण क्षेत्रोंमें भी सर्वप्रथम अंग्रेजीके अंक सिखाये जाते हों ?” तो उसने कहा, “मुझे तो ‘एफॉर एप्पल’से ‘जेडफॉर फॉर जेब्रा’ भी स्मरण हैं । मैं यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गयी; किन्तु जब मैं ख्रिस्ताब्द २००८ से २०१० तक झारखण्ड स्थित अपने पिताके पैतृक ग्राममें एकांतवास कर रही थी तो मैंने यह, वहांके विद्यार्थियोंके साथ भी होता हुआ पाया अर्थात् अब ग्रामीण भागोंमें भी लोगोंपर अंग्रेजीका भूत सिर चढकर बोल रहा है और आजके विवेकशून्य स्वभाषाभिमानशुन्य शिक्षक इस प्रकार भारतकी अगली पीढीका निर्माण कर रहे हैं ! इस स्थितिको परिवर्तित करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करना अपरिहार्य हो गया है – तनुजा ठाकुर
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