अनेक हिन्दू धर्मद्रोही नेतागण बार-बार हिन्दुओंकी धार्मिक भावनाओंको मात्र अपनी राजनीतिक स्वार्थसिद्धि हेतु आहत करनेका दुस्साहस करते रहते हैं, तब भी वे इस देशकी राजनीतिमें जनताद्वारा चयनित होकर आते हैं, इससे लज्जास्पद तथ्य इस हिन्दू बहुल आस्तिक देशके लिए और क्या हो सकता है ?
हिन्दू राष्ट्रमें ऐसा नहीं होगा, मात्र राष्ट्रनिष्ठ और धर्मनिष्ठ व्यक्तियोंको ही उत्तरदायी समष्टि पद दिया जाएगा; क्योंकि तब चुनाव नहीं होंगे, संतोंद्वारा सभी महत्त्वपूर्ण पदोंपर नियुक्तियां होंगी ! स्वार्थी, अवसरवादी और लोभी प्रजा राजाको चयनित करनेकी पात्रता नहीं रखती है, इस निधर्मी, असफल लोकतन्त्रने यह सीख तो अवश्य ही इस देशको दे दी है !
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