जबसे इन्दौरमें आई हूं किसी न किसी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रमोंमें जाना हो रहा है । मुझे लगा था कि तीर्थक्षेत्रोंके मध्य यह नगरी है; इसलिए यहांके लोगोंको धर्मका ज्ञान अधिक होगा, किन्तु मुझे यह देखकर बहुत क्षोभ होता है कि यहां भी देहली और मुंबई समान मुख्य अतिथि, सूत्र संचालक एवं मंचपर आसीन होनेवाले माननीय अतिथि एवं विशिष्टगणोंमेंसे ८० % लोग व्यास पीठपर अपने पादत्राण (जूते-चप्पल) पहनकर जाते हैं ! मेरी स्थिति उस समय बडी विचित्र होती है जब मैं भी मंचपर होती हूं और अन्य अतिथिगण पादत्राण पहनकर उसकी विडम्बना करते हुए उसपर चढकर आ जाते हैं ! हिन्दुओंका अहंकार तो आज साधनाके अभावमें सातवें आकाशपर रहता है, ऊपरसे मंचपर आनेवाले अतिथियोंको यदि कुछ मंचसे बोल दिया जाए तो उनके अहंको त्वरित ठेस पहुंच जाती है जबकि मैं बहुत विनम्रतासे यह कहती हूं किन्तु आजका बहिर्मुख हिन्दू अपनी चूकोंको सुनने हेतु कदापि तत्पर नहीं रहता ! इसलिए आज इसे लिख रही हूं, इसे अधिकसे अधिक जनोंमें साझा कर समाजको जागरूक करें ! व्यासपीठ महर्षि व्यासका प्रतीक स्थान है, उसकी मर्यादाका सभी हिन्दुओंने अवश्य ही ध्यान रखना चाहिए ! – तनुजा ठाकुर (२५.१०.२०१८)
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