जम्‍मू-कश्‍मीरमें सुरक्षा बलोंको मिली बडी सफलता, घाटीसे बुरहान वानी आतंकी गुट समाप्त हुआ !


मई ३, २०१९

जम्‍मू-कश्‍मीरके शोपियांमें शुक्रवार, ३ अप्रैलको सुरक्षा बलोंको एक बडी सफलता हाथ लगी । सेना, सीआरपीएफ और जम्‍मू-कश्‍मीर पुलिसके संयुक्‍त अभियानमें आतंकवादियोंके ‘पोस्‍टर बॉय’
बुरहान वानीके ब्रिगेड कमांडर लतीफ अहमद डारको मार गिराया गया । लतीफके साथ आतंकी संगठन ‘हिज्‍बुल मुजाहिदीन’के दो और आतंकवादी मारे गए हैं । लतीफकी मृत्युके साथ ही घाटीसे बुरहान गुट समाप्त हो गया है ।


इमाम साहिब गांवमें शुक्रवार प्रातःकाल सुरक्षा बलोंने गुप्‍त सूचनाके आधारपर क्षेत्रको घेर लिया । इसी मध्य वहां छिपे हिज्‍बुल आतंकवादियोंने गोलीबारी आरम्भ कर दी । दोनों ओरसे गोलीबारीमें हिज्‍बुलके तीन आतंकी ढेर हो गए । मारे गए आतंकवादियोंका अभिज्ञान हिज्‍बुल कमांडर लतीफ अहमद डार, तारिक मौलवी और शरिक अहमद नेंगरुके रूपमें हुआ ।


इन आतंकवादियोंके पाससे भारी मात्रामें शस्त्र मिले हैं । लतीफ पुलवामाका रहनेवाला है, वहीं तारिक तथा शरिक अहमद नेंगरु शोपियांके रहनेवाले हैं । लतीफ वर्ष २०१४ से आतंकी गतिविधियोंमें लिप्‍त था । उल्लेखनीय है कि वर्ष २०१६ में हिजबुल मुजाहिदीनके कमांडर और आतंकके नूतन ‘पोस्टर ब्वॉय’ बने बुरहान वानीकी १० अन्य आतंकियोंके साथ चित्र सामने आनेके पश्चात खलबली मच गई ।

बादमें सुरक्षा बलोंने ८ जुलाई, २०१६ को एक मुठभेडमें बुरहान वानीको मार गिराया था । बुरहानके मारे जानेके पश्चात घाटीमें तनाव फैल गया था । तबसे लेकर अबतक सैंकडों लोग इस हिंसामें मारे गए हैं । हिज्‍बुलके अति वाञ्छित (वॉन्टेड) आतंकी रहे बुरहान वानीको लेकर घाटीमें दो दृष्टिकोण हैं । सामाजिक प्रसार माध्यमोंपर घाटीके युवाओंमें अत्यधिक प्रसिद्ध बुरहान वानी कौन था ?, तो दो उत्तर मिलते थे । कुछ माह पूर्वतक स्थानीय लोगोंसे पूछनेपर वे उसे ‘भारतीय एजेंट’ बुलाते थे, जबकि सुरक्षा विभागके लिए वह समाचार माध्यमोंका बनाया हुआ कागदका (कागजका) शेर था ।


पुलवामाके त्रालमें जन्मा बुरहान १५ वर्षकी आयुमें ही आतंकवादी बन गया था और २२ वर्षोंकी आयुमें वह मुठभेडमें मारा गया । बुरहानके मुठभेडसे पूर्व जैश संगठन घाटीमें समाप्त होनेकी सीमापर पहुंच गया था; परन्तु लगभग तीन वर्षोंमें आतंकी संगठन ‘जैश’ पुनः घाटीमें जीवन्त हो गया । ‘जैश-ए-मोहम्मद’का उद्देश्य कश्मीरमें सैकडों बुरहान वानी सज्ज करना है ।

रक्षा सूत्रोंके अनुसार ‘जैश-ए-मोहम्मद’ पहले ‘लश्कर-ए-तैयबा’ और ‘हिज्बुल मुजाहिदीन’के नीचे कार्य करता था; परन्तु इस वर्ष सुरक्षाबलोंपर हुए लगभग सभी आक्रमणमें जैशकी भागीदारी रही है । पुलवामा, पाकिस्तानकी सीमासे दूर है; इसलिए पाकिस्तानसे आए आतंकवादियोंका यहां पहुंचना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है । जैशने स्थानीय युवकोंकी भर्ती आरम्भ की । उन्‍होंने बताया कि पाकिस्तानमें बैठे आतंकवादी मसूद अजहरको १९९४ में दक्षिणी कश्मीरके अनन्तनागसे ही बन्दी बनाया गया था । यद्यपि १९९९ में वायुयान अपहरणके (हाइजैकके) पश्चात शासनने यात्रियोंके बदले उसे छोड दिया था । इसके पश्चात ही ‘जैश-ए-मोहम्मद’का जन्म हुआ ।


“युवाओंको भ्रमितकर जिहादकी ओर प्रवृत्त करनेवाली इस्लामिक संस्थाएं भारतकी दुर्गतिका कारण बनी हैं । सोचिए ! यदि इन इस्लामिक संस्थाओंको पहलेसे ही प्रतिबन्धित कर दिया होता तो कोई युवा बुरहान वानी आतंकवादीके रूपमें सज्ज ही न होते ! भारत शासन अब भी जागे और हमारे शूरवीर सैनिकोंका बलिदान व उनका शौर्य, जिसके बलपर वे घाटीमें आए दिन आतंकियोंको मार रहे हैं, उसे नष्ट न होने दे और शेष जो आतंकको प्रोत्साहित करनेवाली संस्थाएं हैं, उन्हें बन्द करें !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ



स्रोत : नभाटा



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