अधर्मकी पराकाष्ठा, ब्राह्मण अभियन्ताके शिखा रखनेपर उसकी पत्नीने तलाककी याचिका दी !!


मई १२, २०१९



भोपालमें एक ब्राह्मण परिवारके पुरुषकी चोटी (शिखा) उसके लिए विघ्न बन गई है । स्थिति यह है कि परिवार बिखरनेकी सीमापर पहुंच गया है । पारिवारिक न्यायालयमें प्रविष्ट अभियोगमें पत्नीका कहना है कि चोटी रखनेके कारण पति गंवारोंकी भांति दिखाई देता है । उसके मायकेवाले पतिका उपहास करते हैं, जिससे उसे अपमानित होना पडता है । जबकि पतिका कहना है कि उसने मन्नत रखी है कि वह चोटी रखेगा । यह उसकी मृत्युके साथ जाएगी ।

प्रकरणको पारिवारिक न्यायालयने उपबोधनमें (काउंसलिंगमें) रखा है । अरेरा उपनिवेश (कॉलोनी) निवासी एक महिलाने विवाहके तीन वर्ष पश्चात तलाकके लिए आवेदन दिया । इस प्रकरणमें न्यायालयने जब उपबोधन कराया तो ज्ञात हुआ कि दोनोंके मध्य झगडेका मूल पतिद्वारा रखी गई शिखा अर्थात चोटी है । पत्नीका कहना है कि शिखा रखनेके कारण पति गंवारकी भांति दिखता है । वह उसके स्तरका नहीं है । जबकि पति कार्यकारी (एक्जीक्यूटिव) अभियन्ता है । पत्नी ‘एमबीए’से स्नातक है ।

परामर्शदाता (काउंसलर) सरिता राजानीने बताया कि महिलाका विवाह २ फरवरी २०१६ को हुआ था । विवाहके वर्ष तो सब कुछ अच्छा रहा । दो वर्ष पश्चात उसके सास और ससुरकी मृत्यु सडक दुर्घटनामें हो गई थी । मृत्युके कर्मकाण्डके समय पतिका मुण्डन हुआ । उसमें पतिने धार्मिक मान्यताके अनुसार शिखा रख ली । उसके पश्चात जब पतिने शिखा नहीं कटाई तो उसने टोकना आरम्भ किया । महिलाने बताया कि पतिको चोटी कटानेको कहो तो वह बातको टाल जाते हैं । चोटी रखनेसे सब पतिको पण्डितजी कहने लगे । इस बातको लेकर उनमें झगडा बढता गया ।

महिलाने बताया कि पतिने जिद ठान ली है कि वह कभी अपनी शिखा नहीं कटाएगा । उसकी चोटी मृत्युके पश्चात शरीरके साथ जलेगी । इधर, पतिका कहना है कि पत्नीको सारे सुख हैं । वह उसकी चोटीके पीछे पडी है । इसको लेकर पत्नी छह माहसे मायकेमें है । पत्नीकी जिद है कि सिरपर चोटी रखो या तलाक दो !

युवकका कहना है कि उसने माता-पिताकी मृत्युके पश्चात संकल्प लिया था कि वह चोटी रखेगा । यह उसकी धार्मिक मान्यता है । वह अपने परिवारमें एकमात्र पुत्र है । उसे सभी मान्यताओंका पालना करना पडता है । उसका कहना है कि इससे उसे सुख भी मिलता है । दोनों एक-दूसरेकी बात सुनने सज्ज नहीं हैं । न्यायालयको आशा है प्रकरणमें वार्ताके माध्यमसे सन्धि हो जाएगी ।

 

“मैकॉले शिक्षण पद्धतिने युवाओंकी बुद्धिको कैसे भ्रमित किया है कि संस्कारोंका पालन अब उन्हें गंवारपना दिखने लगा है और इसके पीछे वे अपने सात जन्मोंके सम्बन्धोंको भी तोडनेको सज्ज हैं ! एक बारके लिए पुरुष यदि अपनी शिखा कटवा भी ले कि उसका घर बच जाएगा; परन्तु सात जन्मोंतक साथ निभानेका वचन देकर चोटीके पीछे अपने पतिको छोडनेवाली स्त्री क्या पत्नी कहलाने योग्य है ? जन्मब्राह्मणको ही जब शिखा रखनेसे उपहासका पात्र बनना पड रहा है, तो इस प्रकरणसे एक बात तो स्पष्ट है कि समाजमें बीज ही अयोग्य पड गया है और इस धर्महीन समाजको सुधारनेके लिए अब बीजसे ही आरम्भ करना होगा !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : भास्कर



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