फरवरी १०, २०१९
सबरीमाला मन्दिरमें महिलाओंके प्रवेशको लेकर केरलके सीपीएम शासनने भले ही प्रगतिशील दिखनेका प्रयास किया हो; परन्तु यह स्थिति सभी स्थितियोंपर लागू नहीं होती है । एक प्रसिद्ध मन्दिरकी देखभाल सीपीएम पार्टीकी ओरसे की जाती है; परन्तु इसमें दलितोंके प्रवेशपर प्रतिबन्ध है । सीपीएमकी विचारधारासे जुडे मन्दिर प्रबन्धकोंने दलितोंको वार्षिक उत्सवसे दूर रखा है ।
इस उत्सवमें परम्पराके रूपमें देवीकी तलवारको घर लेकर जाते हैं । माना जाता है कि इससे सभी तामसिक शक्तियोंका संहार किया जा सकता है । यद्यपि, क्षेत्रमें पडनेवाले ४०० दलित परिवारोंको सम्मिलित होनेकी इच्छाके पश्चात भी उत्सवका भाड नहीं बनने दिया जाता है । रविवारको इस उत्सवका समापन होने जा रहा है और गत छह दिनोंसे देवीके अस्त्र-शस्त्रको एक घरसे दूसरे घर ले जाया जा रहा है ।
‘केरल स्टेट पट्टिका समाजम’ने (केपीजेएस) बताया, “प्रदेशमें भेदभावका यह कोई अकेला प्रकरण नहीं है । ऐसा और भी कई भागोंमें होता है । विडम्बना तो यह है कि सीपीएम अभी प्रदेशमें है । सीपीएम शासन सबरीमालामें महिलाओंके प्रवेशके अधिकारका समर्थन कर रही है । इस मन्दिरके संचालनका काम भी सीपीएमकी विचारधारासे सहमति रखनेवाला वर्ग कर रहा है; परन्तु दलितोंको इससे दूर रखा जा रहा है ।”
मन्दिरके प्रबन्धन समितिके सचिव पीपी गंगाधरनका कहना है, “यह जातिके आधारपर भेदभावका प्रकरण नहीं है । सबको समझना चाहिए कि रातोंरात तो हम मंदिरकी दशकोंसे चली आ रही परम्पराको नहीं परिवर्तित कर सकते हैं । यह प्रकरण भी अभी न्यायालयमें ही है ।”
“सम्भवतः केरलके निधर्मी शासनको इस कार्यके लिए गिरिजाघरोंका आदेश नहीं आया है ! गिरिजाघरोंका आदेश आते ही यह भी किया जाएगा; परन्तु परिस्थिति कुछ ऐसी निर्मित होगी कि अधिकसे अधिक हिन्दुओंका धर्मान्तरण किया जा सके ! केरल शासनका एकमात्र लक्ष्य गिरिजाघरोंके साथ मिलकर अधिकसे अधिक हिन्दुओंका धर्मान्तरण ही है ! हिन्दुओंको यदि अपना अस्तित्व बचाना है तो समयानुसार जातिभेद समाप्तकर, निधर्मियोंके विरुद्घ बोलनेकी आवश्यकता है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : नभाटा
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