शासकीय भूमिपर अतिक्रमण अनुचित, ईश्वर सर्वव्यापी हैं, मद्रास उच्च न्यायालयका निर्णय


२९ जनवरी, २०२२
        मद्रास उच्च न्यायालयने कहा है कि भगवान प्रत्येक स्थानपर उपस्थित हैंं । ईश्वरको अपनी दिव्य उपस्थितिके लिए किसी विशेष स्थानकी आवश्यकता नहीं है । उच्च न्यायालयने ये बातें एक प्रकरणकी सुनवाईके मध्य कही । इस प्रकरणमें न्यायालयको सार्वजनिक भूमिपर मन्दिरको हटानेपर रोक लगानेकी मांग की गई थी । साथ ही मद्रास उच्च न्यायालयने शुक्रवारको कहा कि धर्मके नामपर लोगोंको बांटनेके लिए सभी समस्याओंका मूल कारण कट्टरपन्थी हैं । साथ ही न्यायालयने कहा कि सार्वजनिक भूमिका उपयोग किसी भी जाति और धर्मके लोग कर सकते हैं । यदि याचिकाकर्ता भक्तोंको विनयनगरकी पूजा करनेकी सुविधा देना चाहता है तो वह इसके लिए स्वतन्त्र है; किन्तु इसके लिए वह अपनी भूमि दे, वहां मन्दिर बनवाए और भगवानकी मूर्तिको उसी स्थानपर जाकर रखा जाए !
        उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालयमें याचिका एस पेरियासामी नामके एक व्यक्तिने प्रविष्ट की थी । राज्यके राजमार्ग विभागने तमिलनाडुके वेप्पानथात्तीसे मन्दिर हटानेको कहा था । ये मन्दिर पेरमवलुर जनपदमें है । याचिकाकर्ता ही मन्दिरके ‘ट्रस्टी’ है । उन्होंने उच्च न्यायालयमें याचिका दी कि ये मन्दिर यहां ३ दशकसे भी अधिक समयसे है । साथ ही उन्होंने कहा कि इस मन्दिरको बनाते समय ये ध्यान रखा गया था कि राजमार्गपर (‘हाइवे’पर) वाहनोंको आने-जानेमें कोई समस्या न हो ।
     न्यायालयका तर्क है कि ‘ईश्वर सर्वत्र है, अतः मन्दिरकी आवश्यकता नहीं है !’ इस कुतर्कके अनुसार तो न्यायालयकी भी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि न्याय तो कहीं भी किया जा सकता है, अभियुक्तोंको न्यायालय ही क्यों आना पडता है ? किन्तु जिस प्रकार न्यायिक प्रक्रिया पूर्ण करने हेतु न्यायालयकी आवश्यकता है, वैसे ही मन्दिरकी भी आवश्यकता है । रही बात अतिक्रमणकी तो वस्तुतः आजकी अप्रासंगिक और निधर्मी व्यवस्थाने ईश्वरकी भूमिपर अतिक्रमण किया हुआ है और इस अतिक्रमणको हटाने हेतु ईश्वरीय हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना अपरिहार्य है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ


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