इन्दौर, मध्य प्रदेशके श्री नितिन जोशीकी अनुभूतियां


११ मार्च २०१४ को इंदौरके भक्तवत्सल आश्रमके सन्त परम पूज्य रामानन्द महाराजका देह त्याग हो गया और उनकी महासमाधिमें उपस्थित होने हेतु तनुजा मांका हमारे घर तीन दिवस रहना हुआ।इन तीन दिवसोंमें उनके दिव्य सान्निध्य एवं सेवाका सौभाग्य प्राप्त हुआ और उनकीकृपाके कारण अनेक अनुभूतियां हुईं । प्रस्तुत हैं उनमेंसे दो अनुभूतियां

१. १३मार्चकोप्रात: पांच बजे उठ कर विद्यालय जानेके लिए बच्चोंके लिए दूध ‘गर्म’ कर रहा था तो वातावरण पूर्णतः शान्त था, कि तभी तनुजा मांकी अति मधुर वाणीमें प्रणवके स्वर सुनाई देने लगे, मैंने तत्काल ऊपर जाकर देखा तो वे अपने कक्षमें नहीं थी; किन्तु स्वर पूर्णतः स्पष्ट थे,जब मैंने उनसे ॐ जपनेके विषयमें पूछा तो उन्होंने बताया कि वे उंचे स्वरमें ॐ का उच्चारण कभी करती ही नहीं हैं ।
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२. पूज्या मांको विदा कर जब घर पहुंचा तो जिस कक्षमें वे तीन दिवस रुकीं थीं,वह कक्ष एक दिव्य ते़जसे दमक रहा था ।कक्षमें दिव्य शक्तिका संचार हो रहाथा, मैं शैयापर(बिछावनपर) लेट गया और मुझे झपकी लग गई ।स्वप्नमेंमांने मुझसे आग्रह किया कि आज दिनभरआप यहां न सोएं,आप यहांकी शक्ति सहननहीं कर पाएंगे और मेरी झटसे नींद खुल गई और मैं तुरन्त उठ कर बैठ गया, मैंने पायाकि मेरा सिर भारी हो रहा था । मांकी शक्तिको सहन करना जैसे मेरे लिए असम्भव हो रहा था ।उसके पश्चात् पूरे घरमें एक हलकापनसा अनुभव होने लगा।

३. तीव्र शीतलहर, कोहरा और ओससे घिरी शीत ऋतुमें भी कार्यक्रमके मुख्य दिनोंमें वातावरण इतना सुहाना था कि किसीको एक भी ऊनी वस्त्र पहननेकी आवश्यकता नहीं पडी जबकि उसके एक दिवस पूर्व एक अगले दिवस पुनः कडाकेकी ठण्ड थी ।

४. भण्डारेके मध्य एक स्थानीय पुरुष साधकको पेटमें तीव्र वेदना होने लगी और वह रोने एवं कराहने लगे, मांको तुरंत बतानेपर उनकेद्वारा किए गए आध्यात्मिक उपायसे २० मिनट पश्चात् वे पुन: ऐसे सेवा कर रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो, मांसे पूछनेपर ज्ञात हुआ कि वातावरणमें उपस्थित तीन सन्तोंके चैतन्यसे उन्हें जो अनिष्ट शक्ति कष्ट दे रही थी, वह प्रकट हो गई थी और उस कारण उन्हें कष्ट हो रहा था और उस शक्तिको आध्यात्मिक उपायके कारण गति मिल गई और वे साधक पुनः स्वस्थ हो गए, यह प्रत्यक्ष अनुभव करना अदभुत था ।

५. सवेरे पांच बजेसे देर रात्रि बारह बजेतक तीन दिवस क्रियाशील रहनेके उपरान्त भी कोई थकानका न होना, आश्चर्यजनक था ।

६. गोड्डासे, (झारखण्ड) आनेके पश्चात जब इन्दौरमें मेरी बहन (दीदी) मुझसे मिलने घर आई और उन्हें मैंने उपासनाके समारोहका संस्मरण सुनाया । हमने उस दिवसको स्मरण किया जिस दिन मुझे निकलना था, यथार्थमें झारखण्ड जाना मेरे लिए असम्भव था; अतः दो मास पूर्व ही मैंने जब देहलीके साधक झारखण्ड हेतु आरक्षण करवा रहे थे तब ही मैंने भी अपना आरक्षण करवा लिया था । १८ दिसम्बर २०१३ को जिस दिन मुझे इन्दौरसे देहलीके लिए संध्या चार बजेकी रेलयान लेना था उसी दिवस मेरी माताजी मुझे भोजन करवानेके पश्चात् रसोईघरसे लौटते समय बडी जोरसे गिरी, उनकी चीख सुनकर और स्थिति देख लगा कि उनकी कूल्हेकी हड्डी टूटी होगी । बडी कठिनाईसे उठाकर परीक्षण करवाया और मुझे लगा कि अब मैं नहीं जा पाऊंगा; परंतु ईश्वरकी कृपा और तनुजा मांकी महिमा यह रही कि मांको मात्र गहरी मोच ही आई जो एक – दो मासमें ठीक हो जाएगी । मेरी दीदीने बताया जब तक तुम झारखंडमें तनुजामांके गांव नहीं पहुंचे थे तबतक घरका वातावरण अत्यधिक ही तनावपूर्ण था; परंतु जैसे ही वहां पंहुचे वातावरणमें सुखद परिवर्तन आ गया । (यह सब अनिष्ट शक्तिने बाधा निर्माण करने हेतु किया था – सम्पादक )

अब मुझे समझ आया, गांवमें सभीका स्वागत करनेवाली तनुजा मांने सर्वान्तमें मेरी और ध्यानसे देखते हुए रहस्यमयी मुस्कानके साथ पूछा था, ‘नितिन भैया, आप कैसे आ गए’? यह उनकी ही कृपा थी कि मै वहां पहुंच सका ।

७. मेरी बडी बहनकी अनुभूति – “जब तुम वहांसे भ्रमणभाषपर सारे विवरण बता रहे थे तो तुम्हारी ध्वनि सबको इतना मुग्ध कर रही थी जैसे दिव्य लोकसे आकाशवाणी हो रही हो” !  उनसे वार्ताके मध्य मैंने उन्हें उस गांवके काली मन्दिर और तनुजा मांकी ओजस्विताका प्रताप बताया था । – नितिन जोशी,इन्दौर



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