इंदौर स्थित मानपुरके उपासनाके आश्रममें कार्यरत श्रमिकोंमें साधकत्वके लक्षण जाग्रत होना (भाग-४)


मानपुरके आश्रममें तीन स्थानीय श्रमिक स्त्रियां अन्नपूर्णा कक्षमें सेवाएं देती हैं । इसमें रेखा सिंगारेकी वृत्ति इतनी सन्तोषी है कि ऐसा मैंने अनेक साधकोंमें भी नहीं पाया है । वह अन्नपूर्णा कक्षके सब उत्तरदायित्वोंको धीरे-धीरे सीख रही है । यद्यपि वह अल्पशिक्षित है और उसके पास अन्नपूर्णा कक्षमें उपयोग हेतु आधुनिक यन्त्र नहीं हैं; तथापि उसने सब बहुत ही अल्प समयमें अच्छेसे सीख लिया है ।
वह बहुत ही सात्त्विक है और शिव भक्त है । उसे सेवाके समय कभी भी यूं ही बैठे नहीं देखा है । वह अपनी सेवा पूरे मनोयोगसे करती है । सदैव समयपर आती है ।
एक दिवस वह बाहर बर्तन धो रही थी । उस समय वहांपर कोई छत नहीं थी और अकस्मात वर्षा होने लगी और दो-तीन मिनिटकी सेवा बची थी तो भी उसने भीगकर वह सेवा पूर्ण की । उसी समय मैं अपने कक्षसे बाहर आई तो देखा वर्षा पूरे वेगसे होनेके कारण वह पूर्ण रूपसे भीग गई थी । तब प्रातः के आठ ही बजे थे । मैंने उससे पूछा, “आपने ऐसा क्यों किया ? अब सारा दिन गीले वस्त्रमें कैसे रहेंगी ?”
उसने बहुत सहज होकर कहा कि ये तो एक घण्टेमें सूख जाएंगे । उसके सहज भावसे उत्तर मैं अचम्भित रह गई । मैंने उसे अपनी एक नूतन साडी, पेटीकोट और कंचुकी निकालकर दी जिससे वह गीले वस्त्रमें रहनेके कारण अस्वस्थ न हो जाए ।
आश्रममें फल, मेवा व मिठाई आदि अर्पणके रूपमें आते ही रहते हैं; किन्तु मैंने उसे न ही कभी अपने लिए खाते देखा है न ही मांगते देखा है और न ही अपने परिवारके लिए ही मांगते देखा है । एक निर्धन स्त्रीका इतना सन्तोषी होना बहुत बडी बात है । उसे पता है कि मेरा पथ्य क्या है ? और वह उसे कभी भी नहीं खाती है । मुझे कटहलकी तरकारी प्रिय है और उसे यह बात ज्ञात है । एक दिवस उसने अपने लिए अल्पाहार लेकर थालीमें रखा था तो मैंने देखा उसने रोटीके साथ बहुत ही थोडी तरकारी ली थी । मैंने उससे पूछा कि इतना अल्प शाक क्यों लिया है ? क्या उसे यह शाक प्रिय नहीं ? तो उसने लजाते हुए कहा, “आपको अच्छा लगता है; इसलिए आपके लिए रख दिया है, आप उसे दोपहरमें खा सकती हैं ।” ऐसे प्रसंग अनेक बार हुए हैं ।
उसके पांवमें वेदना रहती है तो मैंने उससे कहा, “आप प्रतिदिन एक ग्लास दूध हलदी डालकर ले लिया करें; किन्तु यदि मैं या कोई साधक उसे न दें वह इसे कभी नहीं लेती है । उसकी यह वृत्ति देखकर लगता है जैसे वह कोई साधक ही है, जिसे भगवानने हमारे कार्यके लिए भेजा है ।
आश्रममें सेवाएं बहुत अधिक होती हैं; किन्तु वह न ही अपने हाव-भावसे कभी इसे प्रकट होने देती है और न ही कभी यह कहती है कि मेरे वेतनमें वृद्धि कर दें । यहां सेवा करना हमारा सौभाग्य है, यह उसे अनेक बार साधकोंसे या अतिथियोंसे कहते सुना है ।



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