
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥
अर्थ : क्योंकि जैसे जलमें चलनेवाली नावको वायु हर लेती है, वैसे ही विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमें से मन जिस इन्द्रियके साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुषकी बुद्धिको हर लेती है | – श्रीमदभगवद्गीता (२: ६७)
भावार्थ : इंद्रियोका निग्रह साधकके लिए उस ब्रह्म स्थितिको पाने हेतु परम आवश्यक है | एक इंद्रिय मनके आवेगको दूषित कर बुद्धिका हरण कर विवेक नष्ट करनेमें पूर्णत: सक्षम होती है | अतः प्रत्येक दोष चाहे वह छोटा हो या बडा साधनाकी दृष्टिकोणसे हानिकारक है और वह दोष कब साधकको साधनापथसे विमुख कर दे यह कहा नहीं जा सकता | स्थितप्रज्ञताको नहीं प्राप्त हुए अनेक साधक, संत और ऋषि अपनी एक छोटीसी चूकके कारण पथभ्रष्ट हुए है, इतिहास इसका साक्षी है और उस चूकके लिए हमारे स्वभावदोष उत्तरदायी होते हैं | अतः साधकके ध्यानपूर्वक अपने इन्द्र्योंका निग्रह करते हुए अपने दोषोंकों दूर कर दिव्य गुणोंको आत्मसात करनेका प्रयास करना चाहिए | हमारे दोषोंका प्रकटीकरण हमारे चूकके माध्यमसे होती है अतः चूकको कभी सहज होकर अनदेखा न करें | प्रत्येक चूक हमें ईश्वरसे दूर करता है अतः प्रतिदिन अपने चूकको लिखें, उसके लिए उत्तरदायी दोषको स्वीकार कर उसे दूर करनेका प्रयास करें | एक ही चूक बार–बार हो तो उसे अक्षम्य पाप कहा जाता है | इंद्रियां अपने प्रवृत्ति अनुसार कार्य करती हैं और आत्मनियंत्रणकी प्रक्रियाका अभ्यास न होनेपर वे कुछ ही क्षणोंमें बुद्धिको हर लेती है | और इंद्रियोंको वशमें करनेका सबसे अच्छा उपाय है साधना करना और अखंड आत्मनिरक्षण करते रहना | पूर्ण आत्मनियंत्रणकी प्रक्रिया साध्य होने तक प्रत्याहार करना यह एक उत्तम उपाय है | अर्थात जिस वस्तुसे आपके मन उत्तेजित होता है उससे दूर रहना |
-तनुजा ठाकुर
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