स्वयंके आध्यात्मिक स्तरके बारेमें जाननेके पश्चात कुछ साधकोंको लगता है कि मेरा आध्यात्मिक स्तर तो कम है, ऐसेमें ईश्वरीय कार्यका माध्यम मैं कैसे बन पाऊंगा ? ऐसे साधकोंने अपने भीतर ऐसी हीन भावना नहीं आने देना चाहिए और इस हेतु राम सेतुके निर्माणके समय गिलहरीकी भूमिका स्मरण (याद) रखें ! भगवान श्री रामने वानरोंसे पुल निर्माण और महापराक्रमी रावणकी आसुरी सेनासे युद्ध करवा लिया था; अतः ईश्वर अपना कार्य किसीसे भी करवानेका सामर्थ्य रखते हैं और जब कोई उनके कार्य हेतु सक्षम नहीं होता तो वे स्वयं अवतार धारणकर कार्य करते हैं , यह सृष्टि उनकी है और इसके संचालन एवं रक्षणका उत्तरदायित्व भी उनका ही है !
ईश्वर अपना सर्व कार्य करनेमें पूर्णत: सक्षम होते हैं, परंतु उनका सिद्धान्त है कि वे अपने कार्य हेतु न्यूनतम शक्तिका उपयोग करना चाहते हैं और जिस माध्यमसे उन्हें कमसे कम शक्तिका उपयोग करना पडे, वे उन्हें अपना माध्यम बनाते हैं । ईश्वर यह नहीं देखते कि आपका आध्यात्मिक स्तर कितना अधिक या न्यून है, वे तो मात्र यह देखते हैं कि हम उनके कार्योंको कितनी उत्कण्ठासे करने हेतु सातत्यसे प्रयास करते हैं ?, उनके कार्य हेतु समर्थ बननेके लिए हम क्या आवश्यक प्रशिक्षण ले रहे हैं ?, यहां प्रशिक्षणका अर्थ है, व्यष्टि एवं समष्टि साधना हेतु आवश्यक गुणोंको आत्मसात करना ! अतः यह सम्भव है कि एक मुमुक्षु, जिसका आध्यात्मिक स्तर मात्र ४० % हो वह अपने गुणों एवं उत्कण्ठाके कारण ईश्वरद्वारा उनके कार्य हेतु चुना जाए एवं ५० % से अधिक आध्यात्मिक स्तरवाला अहंकारी जीव वैसे ही रह जाए !
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