सबरीमालाको छलसे अपवित्र करनेवाली महिलाको उसके घरवालोंने अपनानेसे अस्वीकार कर दिया है और अब उन्हें अपने मन्दिर रुपी घरको छोडकर किसी आश्रयस्थलमें (शेल्टर होममें) आश्रय लेने हेतु विवश होना पडा है ! भगवानके साथ छल करनेवाले, उनकी अवज्ञा करनेवाले, धर्मकी मर्यादाको तोडनेवालोंके साथ क्या करना चाहिए ?, इस विषयमें सन्त शिरोमणि तुलसीदास जी कहते हैं, “जाके प्रिय न राम वैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही” अर्थात जिन्हें भगवान प्रिय नहीं, उन्हें शत्रु समझकर त्याग करें, चाहे वे आपके कितने ही स्नेही हों !
अनेक आसुरी प्रवृत्तिके आक्रमणकारियोंद्वारा इस देशपर शासन किए जानेपर भी इस देशमें हिन्दू धर्म इसलिए टिका हुआ है; क्योंकि पूर्वकालमें एवं आज भी यहां ऐसे धर्मनिष्ठ हैं जिनके लिए धर्म सर्वोपरि है ! उस परिवारका यह निर्णय व्यक्तिगत स्तरपर उनके लिए निश्चित ही कष्टप्रद होगा; किन्तु समाजमें सभी अपनी धर्म अधिष्ठित मर्यादाओंका पालन करें, इस हेतु उनका यह निर्णय स्वागत योग्य है ! ऐसे धर्मनिष्ठ हिन्दुओंपर हमें गर्व है ! वे हिन्दू धर्मकी शक्ति हैं ! उनके इस निर्णयसे अन्य बुद्धिभ्रष्ट नारियोंको निश्चित ही सीख मिलेगी !
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