आई.वी.एफसे उत्पन्न सन्तानका आध्यात्मिक स्तर कैसा होता है ? आईवीएफसे सन्तान प्राप्त करनी चाहिए ? – श्री कमलकिशोर शर्मा, बीकानेर, राजस्थान


सर्वप्रथम यह जान लें कि आई.वी.एफ.से उत्पन होनेवाले शिशुओंका और आध्यात्मिक स्तरका कोई सम्बन्ध नहीं है । उच्च स्तरकी आध्यात्मिक जीवात्माएं सामान्यत: सात्त्विक माता-पिताके घर जन्म लेते हैं ! और यदि कोई सात्त्विक दम्पती अच्छेसे साधना करे तो उन्हें आई.वी.एफकी आवश्यकता नहीं होती है; किन्तु मैंने ऐसा एक प्रकरण राजस्थानकी हमारी एक साधिकाके साथ होते देखा है । जब हम २०१२ में धर्मयात्राके मध्य मिले थे तो वे ४० वर्ष की थीं; किन्तु निःसन्तान थीं । मेरा उनसे फेसबुकपर मेरे लेखोंको पढनेके क्रममें परिचय हुआ था और धर्मयात्राके मध्य मैं दो बार उनके घर भी गई थी, उन्होंने अपने नगरमें मेरे कुछ प्रवचन भी करवाए थे । जब मैं उनसे दूसरी बार मिली तो वे बहुत भावुक होकर कहने लगीं कि मुझे एक सन्तान चाहिए ही, चाहे वह लडका हो या लडकी, कुछ भी चलेगा ! हम दोनों अकेले थे और कारसे प्रवचनस्थलपर जाने हेतु उनके साथ जा रहे थे और वे मुझे एक निःसंतान स्त्रीकी वेदना क्या होती है ?, समाज उसे कैसे तिरस्कृत दृष्टिसे देखता है ?, वह कैसे प्रतिदिन हृदयको छलनी करनेवाले व्यंग्योंको सहती हैं ?, यह बता रही थीं ! यद्यपि वे उच्च शिक्षित थीं और एक महाविद्यालयमें पढाती थीं तथापि इसे बताते समय वे थोडी भावुक होकर अपने अश्रुको बहुत कठिनाईसे नियन्त्रित करते हुए सब बता रही थीं ! उनके प्रारब्धमें बच्चे थे ही नहीं, ऊपरसे घरमें तीव्र पितृदोष था ! किन्तु उस पल मेरा स्त्री-मन उनके प्रति करुणासे भर गया और मैंने उनसे कहा, “अच्छेसे साधना और सेवा करें, क्या पता गुरुकृपा हो जाए और आपकी इच्छा पूर्ण हो जाए !

    मुझे ऐसा लगता है कि मेरे करुणानिधान श्रीगुरु सदैव सूक्ष्मसे मेरे साथ रहते हैं और मैंने ऐसा पाया है कि जब भी कोई मुझसे कुछ आर्ततासे मांगता है तो मुझमें तो किसीको कुछ देनेका सामर्थ्य नहीं है; किन्तु मेरे श्रीगुरु उसे अवश्य ही पूर्ण कर देते हैं ! मेरे पास इसके अनेक उदाहरण हैं ! वह स्त्री जबसे मुझसे फेसबुकद्वारा जुडी थीं तबसे नियमित नामजप करती थीं और उस दिवससे जो भी मैं सेवा देती थी, उसे वह करने लगी थीं । कुछ समय पश्चात उनके पति भी सेवामें आ गए और वे दोनों अपने घरसे संगणकसे (कंप्यूटरसे) सम्बन्धित सेवा करने लगे । दो या ढाई वर्ष पश्चात एक दिवस उन्होंने शुभ समाचार दिया कि वे गर्भवती हैं और उन्हें आई.वी.एफके माध्यमसे सन्तान प्राप्ति होनेवाली है ! मुझे यह सुनकर बहुत आनंद हुआ, उनके घर तीव्र पितृदोष था; और उनके गर्भमें तीन शिशु थे; अतः गर्भपात होनेकी ७५ % सम्भावनाएं थीं; इसलिए मैंने बिना एक दिवस भी व्यर्थ किए उनके गर्भस्थ शिशुके रक्षण हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक उपचार और नामजप बताये !

  कुछ काल उपरान्त जब उन्होंने बताया कि उन्हें दो स्वस्थ पुत्रियां प्राप्त हुई हैं और पुत्रकी मृत्यु जन्मसे कुछ घंटे पूर्व ही गर्भमें हो चुकी थी तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ; क्योंकि गर्भमें एक पुत्र और दो पुत्रियां थीं, यह मुझे ज्ञात था ! मैंने उन्हें उसी अनुसार सर्व उपाय बताये थे । जब मैंने उनसे कुछ माह उपरान्त पूछा कि क्या उन्होंने मेरे बताये हुए ‘श्री गुरुदेव दत्त’का जप किया था ? तो उन्होंने कहा, “नहीं, मैंने वह नहीं किया, यदा-कदा भगवान श्रीकृष्णका नामजप कर लेती थी !” मैं समझ गई पुत्रकी मृत्यु क्यों हो गई ?, वस्तुत: अतृप्त पितरने कवचके अभावमें गर्भस्थ नर शिशुपर आक्रमणकर उसे मार दिया था; (दत्तका जप उस शिशुके कवच हेतु मैंने बताया था) किन्तु अन्य सर्व उपाय करनेके कारण दोनों पुत्रियां स्वस्थ थीं, (उनके गर्भमें तीनों शिशु उच्च स्वर्गलोकके साधक जीव थे ।)

   यह प्रकरण मैं क्यों बता रही हूं कि आपको यह ज्ञात हो कि यदि गुरुकृपा हो तो आई.वी.एफके माध्यमसे उच्च आध्यत्मिक स्तरके सन्तानकी प्राप्ति सम्भव है । किन्तु सामान्यत: जैसे धारोष्ण दुग्ध (अर्थात माताके स्तनसे बिना वायुके स्पर्शका दूध) स्वास्थ्यवर्धक होता है, वैसे ही नैसर्गिक विधिसे सन्तान प्राप्ति और कृत्रिम विधिसे जो भ्रूणका स्थापन किया जाता है, उनमें बहुत अंतर होता है ! कृत्रिम गर्भाधान करते समय उस भ्रूणपर अनिष्ट शक्तियां बहुत अधिक काली शक्तिका प्रक्षेपण करती हैं या उसे दूषित करनेका प्रयास करती हैं और आजकलके माता-पिता और वैद्य दोनों ही साधना नहीं करते हैं; इसलिए यदि कृत्रिम गर्भाधानसे उच्च आध्यात्मिक जीवका जन्म हो भी जाए और यदि उसके गर्भकालमें ही सर्व आध्यात्मिक उपाय न किए जाएं तो उस शिशुको आजीवन बहुत अधिक कष्ट होता है; क्योंकि जिन दम्पतीको सन्तानें नहीं होती हैं, उनमें अधिकांशको अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट होता ही है; अतः अपना नियोजन विफल होते देख अनिष्ट शक्तियां और भी अधिक शक्तिसे आक्रमण करती हैं और इस विषयमें दम्पतीमें अज्ञानताके कारण वे सफल भी हो जाती हैं; इसलिए ऐसे माता-पिताका साधनारत रहना अति आवश्यक होता है और अब तो शोधमें भी प्रमाणित हो चुका है कि कृत्रिम गर्भाधानसे जन्म लिए शिशुओंको सामान्य बच्चोंकी अपेक्षा अधिक प्रमाणमें शारीरिक और आध्यात्मिक कष्ट होता है ! किन्तु शिवत्वहीन विज्ञान न ही इसका कारण समझ सकता है और न ही इसका कोई निवारण ढूंढ सकता है ! यह प्रकरण मैंने सूक्ष्म जगतके ग्रन्थमें संकलित कर रखा है ! इस प्रकरणमें मैं स्वयं भी आई.वी.एफके माध्यमसे सन्तान प्राप्तिके विषयमें शोध कर रही थी और मेरे शोध और सूक्ष्म इन्द्रियोंसे ज्ञात सर्व तथ्योंकी कुछ समयमें पुष्टि भी हो गई !



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