
घटना उन दिनोंकी है जब भारतपर चंद्रगुप्त मौर्यका शासन था और आचार्य चाणक्य यहांके महामंत्री थे और चन्द्रगुप्तके गुरु भी थे उन्हींके मार्गदर्शनमें चन्द्रगुप्तने भारतकी सत्ता प्राप्त की थी ।
चाणक्य अपनी योग्यता और कर्तव्यपालनके लिए देश विदेशमें प्रसिद्ध थे । उन दिनों एक चीनी यात्री भारत आया । यहां भ्रमण करते हुए जब वह पाटलीपुत्र पहुंचा तो उसकी इच्छा चाणक्यसे मिलनेकी हुई । उनसे मिले विना उसे अपनी भारत यात्रा अपूर्ण प्रतीत हुई । पाटलिपुत्र उन दिनों मौर्य वंशकी राजधानी थी ।
वहीं चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य भी रहते थे; परन्तु उनके रहनेका पता उस यात्रीको नहीं था अतएव पाटलिपुत्रमें प्रातःकाल भ्रमण करते वह गंगा किनारे पहुंचा ।
यहां उसने एक वृद्धको देखा जो स्नान करके अब अपनी धोती धो रहा था । वह सांवले रंगका साधारण व्यक्ति लग रहा था; परन्तु उसके मुखपर गंभीरता थी । उसके लौटनेकी प्रतीक्षामें यात्री एक ओर खडा हो गया । वृद्धने धोती धो कर अपने घडेमें पानी भरा और वहांसे चल दिया । जैसे ही वह यात्रीके निकट पहुंचा, यात्रीने आगे बढकर भारतीय शैलीमें हाथ जोड कर प्रणाम किया और बोला , “महाशय मैं चीनका निवासी हूं, भारतमें काफी घूमा हूं, यहांके महामंत्री आचार्य चाणक्यके दर्शन करना चाहता हूं । क्या आप मुझे उनसे मिलनेका पता बता पाएंगे ?” वृद्धने यात्रीका प्रणाम स्वीकार किया और आशीर्वाद दिया । तत्पश्चात् उसपर एक दृष्टि डालते हुए बोला, “अतिथिकी सहायता करके मुझे प्रसन्नता होगी, आप कृपया मेरे साथ चलें ।”
तत्पश्चात् आगे-आगे वह वृद्ध और पीछे-पीछे वह यात्री चल दिए । वह मार्ग नगरकी ओर न
जा कर वनकी ओर जा रहा था । यात्रीको आशंका हुई कि वह वृद्ध उसे किसी संदिग्ध स्थानपर तो नहीं ले जा रहा है !!! तत्पश्चात् भी उस वृद्धकी रुष्टताके भयसे वह कुछ कह नहीं पाया । वृद्धके मुखपर गंभीरता और तेज इतना था कि चीनी यात्री उसके सम्मुख स्वयंकी हीनताका आभास कर रहा था । उसे इस बातकी भली भांति जानकारी थी कि भारतमें अतिथियोंके साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है और सम्पूर्ण भारतमें चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्तका इतना प्रभाव था कि कोई अपराध करनेका साहस नहीं कर सकता था, इसलिए वह अपनी सुरक्षाके प्रति निश्चिंत था । वह यही सोच रहा था कि चाणक्यके निवास स्थानमें पहुंचनेके लिए ये छोटा मार्ग होगा !
वृद्ध लम्बे-लम्बे डग भरते हुए तीव्रतासे चल रहा था । चीनी यात्रीको उसके साथ चलनेमें असुविधा हो रही थी; अतः वह पिछडने लगा । वृद्धको उस यात्रीकी व्यथाका भान हो गया; अतः वह धीरे-धीरे चलने लगा । अब चीनी यात्री आरामसे उसके साथ चलने लगा । सम्पूर्ण मार्गमें वे प्रायः मौन ही आगे बढते रहे । कुछ देर पश्चात् वृद्ध एक आश्रमके निकट पहुंचा जहां चारों ओर शांति थी, विभिन्न प्रकारके फूल पत्तियोंसे आश्रम आच्छादित था ।
वृद्ध वहां पहुंच कर रुका और यात्रीको वहीं किंचित् समय प्रतीक्षा करनेके लिए कह कर आश्रममें चला गया । यात्री सोचने लगा कि वह वृद्ध संभवतः इसी आश्रममें रहता होगा और अब पानीका घडा और भीगे वस्त्र रख कर कहीं आगे चलेगा ।
कुछ क्षण उपरांत यात्रीसे सुना ,“महामंत्री चाणक्य अपने अतिथिका स्वागत करते हैं, पधारिए महाशय !” यात्रीने दृष्टि उठाई और देखता रह गया !!! वही वृद्ध आश्रमके द्वारपर खडा उसका स्वागत कर रहा था । उसके मुंहसे आश्चर्यसे निकल पडा “आप ?”
“हां महाशय” वृद्ध बोला “मैं ही महामंत्री चाणक्य हूं और यही मेरा निवास स्थान है । आप निश्चिंत होकर आश्रममें पधारें । ”
यात्रीने आश्रममें प्रवेश किया; परन्तु उसके मनमें यह आशंका बनी रही कि कहीं उसे मूर्ख तो नही बनाया जा रहा है । वह इस बातपर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था कि एक महामंत्री इतनी सरलताका जीवन व्यतीत करता है । नदीपर एकाकी (अकेले) ही पैदल स्नानके लिए जाना । वहांसे स्वयं ही अपने वस्त्र धोना, घडा भर कर लाना और राजधानीसे दूर आश्रममें रहना, यह सब चाणक्य जैसे विश्वप्रसिद्ध व्यक्तिकी ही दिनचर्या है !!! उसने आश्रममें इधर उधर देखा । साधारण प्रकारका कक्ष एवं सामग्री थी । एक कोनेमें उपलोंका ढेर लगा हुआ था । वस्त्र सुखानेके लिए बांस टंगा हुआ था । दूसरी ओर मसाला पीसनेके लिए सील बट्टा रखा हुआ था । कहीं कोई राजसी ठाट-बाट नहीं था । चाणक्यने यात्रीको अपनी कुटियामें ले जाकर आदर सहित आसनपर बैठाया और स्वयं उसके सामने दूसरे आसनपर बैठ गए ।
यात्रीके मुखपर बिखरे हुए भाव समझते हुए चाणक्य बोले, “महाशय, संभवतः आप विश्वास नहीं कर पा रहे है कि इस विशाल राज्यका महामंत्री मैं ही हूं तथा यह आश्रम ही महामंत्रीका मूल निवास स्थान है । विश्वास कीजिए ये दोनों ही बातें सत्य हैं ।
कदाचित आप भूल रहे हैं कि आप भारतमें है, जहां कर्तव्यपालनको महत्त्व दिया जा रहा है,
बाह्य आडंबरको नहीं । यदि आपको राजसी भव्यता देखना है तो आप सम्राटके निवास स्थानपर पधारें, राज्यका स्वामी और उसका प्रतीक सम्राट होता है, महामंत्री नहीं ।”
चाणक्यकी बातें सुन कर चीनी यात्रीको स्वयंपर लज्जा आई कि उसने व्यर्थ ही चाणक्य और उनके निवास स्थानके बारेमें शंका की ।
संयोगसे उसी समय वहां सम्राट चन्द्रगुप्त अपने कुछ कर्मचारियोंके साथ आ गए । उन्होंने अपने गुरुके पैर छूए और कहा, “गुरुदेव राजकार्यके संबंधमें आपसे कुछ मार्गदर्शन लेना था इसलिए उपस्थित हुआ हूं ।
इसपर चाणक्यने आशीर्वाद देते हुए कहा, “उस संबंधमें हम किसी और समय बात कर लेंगे, अभी तो तुम हमारे अतिथिसे मिलो, यह चीनी यात्री हैं । इन्हें तुम अपने राजमहल ले जाओ । इनका भली- भांति स्वागत करो और तत्पश्चात् संध्याको भोजनके उपरांत इन्हें मेरे पास ले आना, तब इनसे बातें करेंगे ।” सम्राट चन्द्रगुप्त आचार्यको प्रणाम करके यात्रीको अपने साथ ले कर लौट गए । संध्याको चाणक्य किसी राजकीय विषयपर चिंतन करते हुए कुछ लिखनेमें व्यस्त थे । सामने ही दीपक जल रहा था । चीनी यात्रीने चाणक्यको प्रणाम किया और एक ओर बिछे आसनपर बैठ गया । चाणक्यने अपनी लेखन सामग्री एक ओर रख दी और दीपक बुझा कर दूसरा दीपक जला दिया । इसके उपरांत चीनी यात्रीको संबोधित करते हुए बोले, “महाशय, हमारे देशमें आप पर्याप्त भ्रमण कर चुके हैं । कैसा लगा आपको यह देश ?” चीनी यात्री नम्रतासे बोला, “आचार्य, मैं इस देशके वातावरण और निवासियोंसे अत्यंत प्रभावित हुआ हूं; परन्तु यहांपर मैंने ऐसी अनेक विचित्रताएं भी देखीं हैं जो मेरी समझसे परे हैं ।”
“कौन सी विचित्रताएं, मित्र ?” चाणक्यने स्नेहसे पूछा ।
“उदाहरणके लिए सरलताकी (सादगी) ही बात की जा सकती है । इतने बडे राज्यके महामंत्रीका जीवन इतनी सरलता भरा होगा, इसकी तो कल्पना भी हम विदेशी नहीं कर सकते,” ऐसा कह कर चीनी यात्रीने अपनी बात आगे बढाई, “अभी अभी एक और विचित्रता मैंने देखी है आचार्य, आज्ञा हो तो कहूं ?” “अवश्य कहो मित्र, आपका संकेत कौन सी विचित्रताकी ओर है ?”
“अभी अभी मैं जब आया तो आप एक दीपकके प्रकाशमें कार्य कर रहे थे । मेरे आनेके उपरांत उस दीपकको बुझा कर दूसरा दीपक जला दिया । मुझे तो दोनों दीपक एक समान लग रहे हैं । तत्पश्चात् एकको बुझा कर दूसरेको जलानेका रहस्य मुझे समझ नहीं आया ?”
आचार्य चाणक्य मंदमंद मुस्कुरा कर बोले, “इसमें ना तो कोई रहस्य है और ना विचित्रता ।
इन दोनों दीपकोमें से एकमें राजकोषका तेल है और दूसरेमें मेरे अपने परिश्रमसे अर्जित धनसे क्रय किया गया तेल । जब आप यहां आए थे तो मैं राजकीय कार्य कर रहा था इसलिए उस समय राजकोषके तेलवाला दीपक जला रहा था । इस समय मैं आपसे व्यक्तिगत बातें कर रहा हूं इसलिए राजकोषके तेलवाला दीपक जलना उचित और न्यायसंगत नहीं है; अतः मैंने वह दीपक बुझा कर अपनी आयवाला दीपक जला दिया ।”
चाणक्यकी बात सुन कर यात्री विस्मित रह गया और बोला, “धन्य हो आचार्य, भारतकी प्रगति और उसके विश्वगुरु बननेका रहस्य अब मुझे समझमें आ गया है । जबतक यहांके लोगोका चरित्र इतना ही उन्नत और महान बना रहेगा, उस देशकी प्रगतिको संसारकी कोई भी शक्ति नहीं रोक सकेगी । इस देशकी यात्रा करके और आप जैसे महात्मासे मिल कर मैं स्वयंके गौरवशाली होनेका अनुभव कर रहा हूं ।
Well written and thanks for sharing.
Jay kautilya
उत्तम प्रेरक कथा.