जग्गी वासुदेवने मन्दिरोंपर शासकीय नियन्त्रणका किया विरोध
२४ जनवरी, २०२१
‘सीएनएन’के संवाददाता आनन्द नरसिम्हनके साथ सद्गुरु जग्गी वासुदेवके वार्तालापका दृश्यपट ‘वायरल’ हो रहा है, जिसमें सद्गुरु जग्गी वासुदेव प्रश्न उठा रहे हैं कि जब ‘एयर लाइंस’, उद्योग, खनन, व्यापार आदिका प्रबन्धन शासनके हाथमें नहीं; तो मात्र हिन्दू मन्दिरोंके प्रबन्धनमें शासकीय हस्तक्षेप क्यों ?
सद्गुरु इस दृश्यपटमें इतिहासकी बात करते हुए कहते हैं कि मन्दिरोंपर अधिकार करनेके उद्देश्यसे ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी’द्वारा ‘मद्रास रेगुलेशन एक्ट’ १८१७ में लाया गया, जिसे १८४० में निरस्त किया गया । इसके उपरान्त १८६३ में ‘रिलीजस अडोवमेन्ट एक्ट’ लाया गया, जिसके अनुसार सभी मन्दिर ‘ब्रिटिश ट्रस्टी’को सौंप दिए गए । तब ‘ट्रस्टी’ ही मन्दिर चलाते थे; परन्तु इसमें मन्दिरोंसे प्राप्त धन अधिकतम मन्दिरोंके कार्योंपर ही व्यय किया जाता था । जब १९२५ में मन्दिरोंके संग गिरिजाघर व मस्जिदोंको इस विधानके अन्तर्गत लानेके प्रयास स्वरूप ब्रिटिश शासन ‘द मद्रास रिलीजियस एंड चैरिटेबल एडावमेंट एक्ट-१९२५’ लाई; तो इसका ईसाई व मुसलमान समाजने घोर विरोध किया । ब्रिटिश शासनने तब इस विधानको परिवर्तित कर दिया । इसमें पुनः १९३५ में परिवर्तन किए गए । स्वतन्त्रता पश्चात तमिलनाडु शासनने १९५१ में ‘हिन्दू रिलीजस एंड एडोवमेंट एक्ट’ पारित किया, तो मठों और मन्दिरोंने इसे उच्चतम न्यायालयमें चुनौती दी । तब तत्कालीन कांग्रेस राज्य शासनने इसमें कुछ परिवर्तन किए, तभीसे मन्दिरोंमें चढावेमें आया ६५ – ७०% धन प्रशासकीय कार्योंपर व्यय किया जाता है ।
सद्गुरु जग्गी वासुदेव बताते हैं कि देशके ३७००० मन्दिर शासकीय नियन्त्रणमें हैं । वे कहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष देशमें शासनको सभी धार्मिक स्थलोंके हस्तक्षेपसे दूरी बनानी चाहिए । वे कहते हैं कि लोग तर्क देते हैं कि मन्दिर पूर्व कालमें राजाके आधीन होते थे; परन्तु राजा श्रद्धालु होते थे । वे अनेक बार देवताके प्रतिनिधि बनकर राज्य करते दृष्टिगत होते थे ।
अब शासकीय नियन्त्रणमें मन्दिरोंकी हानि हो रही है । विशेषकर तमिलनाडुके १००० वर्ष पूर्वके सुन्दर पत्थरोंके मन्दिरोंपर चांदीका रंग चढा दिया गया है, जिससे उनकी सुन्दरता न्यून हो गई है ।
वे कहते हैं कि तमिलनाडु राज्यमें कोई मन्दिर प्रसिद्ध हो जाए, तो त्वरित शासन उसे नियन्त्रणमें ले लेता है । वे कहते हैं कि देशको अग्रणी करना है तो सभीको संग लेकर चलना होगा । सभी धर्मियोंकी आस्थाको एक दृष्टिसे देखना होगा । बहुसङ्ख्यक समाज अपनी आस्थाका नियन्त्रण करनेमें सक्षम है ।
जग्गी वासुदेवका कथन उचित है । शासनको विधानमें परिवर्तन लाकर हिन्दू मन्दिरोंका कार्यभार हिन्दू समाजको हस्तान्तरित करना चाहिए, जिससे हमारेद्वारा दिए गए दानके धनका उपयोग मात्र हमारे मन्दिरोंके संरक्षण हेतु हो; परन्तु क्या शासन इसे सुनेगा ? नहीं, कदापि नहीं । अब यह केवल हिन्दू राष्ट्र आनेपर ही होगा । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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