कुछ व्यक्ति जो एक-दो बार उपासनाके आश्रममें आ चुके होते हैं वे मुझे संगणकीय संपत्रद्वारा (ई-मेल द्वारा) या दूरभाषके माध्यमसे अपने प्रश्न नित्य पूछते रहते हैं । उनमें जिज्ञासा तो होती हैं; किन्तु वे अपनी जिज्ञासाको दूर करने हेतु जो पुरुषार्थ करने चाहिए वे नहीं करते हैं, जैसे कल ही एक व्यक्ति, श्री अरुण कुमारने पूछा है कि पितृपक्षमें पितरोंकी शान्ति हेतु हम क्या करें, जबकि वे पिछले एक वर्षसे धर्मधारा सत्संगसे जुडे हैं, पिछले बीस दिवसोंसे पितृपक्ष और पितृदोषके विषयमें प्रतिदिन सत्संग प्रेषित किया जा रहा है । उसी प्रकार एक और जिज्ञासु हैं, श्री मनीष शर्माजी हैं, वे भी सदैव कोई न कोई जिज्ञासा व्यक्त करते हैं, जबकि उनकी सभी जिज्ञासाओंका उत्तर वे सहज ही धर्मधारा सत्संगसे प्राप्त कर सकते हैं; मैंने उन्हें कई बार कहा है कि आपमें जिज्ञासा है तो सनातन संस्थाके ग्रंथोंका या जालस्थलमें उपलब्ध ज्ञानका वाचन करें, या धर्मधारा सत्संग सुनें या जो लिखती हूं उसे पढें; किन्तु वे इनमेंसे कोई भी प्रयास करने हेतु इच्छुक नहीं रहते और प्रश्न पूछते रहते हैं । इसप्रकार ऐसे अनेक व्यक्ति है जिन्हें लगता है, मैं उनके प्रश्नोंका समाधान कर सकती हूं; अत: वे सदैव प्रश्न पूछते रहते हैं; किन्तु उनकी जिज्ञासा शांति हेतु या ज्ञान प्राप्ति हेतु अपनी ओरसे उन्होंने जो वह प्रयास चाहिए वे नहीं करते हैं ।
जिज्ञासाका होना अच्छी बात है; किन्तु ज्ञानप्राप्ति हेतु पुरुषार्थ करना पडता है, बिना पुरुषार्थके कुछ भी प्राप्त नहीं होता, एक शास्त्रवचन है
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥
अर्थात् उद्यमसे ही सर्व कार्य सिद्ध होते हैं, न कि मात्र इच्छा करनेसे । सोये हुए सिंहके मुखमें मृग स्वयं आकर प्रवेश नहीं करते; अतः जिज्ञासुओंने ज्ञान प्राप्ति हेतु योग्य पुरुषार्थ अर्थात श्रवण, पठन, मनन-चिंतन और अभ्यास करने ही चाहिए । यह सत्य है कि जो ज्ञान ईश्वरीय कृपासे मैंने भिन्न माध्यमोंसे अर्जित किये हैं, उसे बांटना मेरा धर्म है; किन्तु ज्ञान मात्र अधिकारी व्यक्तिको ही दिया जाना चाहिए अन्यथा ज्ञानदाता घोर पापका अधिकारी होता है यह शास्त्रोंमें स्पष्ट रूपसे लिखा गया है ।
किस पात्रको ज्ञान किस माध्यमसे प्राप्त होता है इसका विवेचन कुछ इसप्रकार है –
उत्तम शिष्यको (जो गुरुके लिए या उनके कार्यके लिए ही अपना जीवन समर्पित कर देता है) गुरु मौनसे ज्ञान देते हैं; किन्तु ऐसे शिष्यका अध्यात्मिक स्तर कमसे कम ७० % होना चाहिए, माध्यम स्तरके शिष्यको जो सात्त्विक वृत्तिका हो, जिसका विवेक जागृत हो, जिसकी निश्चयात्मक बुद्धि हो एवं ज्ञान धारण करनेकी क्षमता रखता हो, जिसे संत, गुरु, देवी-देवता, वेदादि धर्मग्रंथोंमें श्रद्धा हो, उसे गुरु, प्रश्नोत्तरके माध्यमसे ज्ञान देते हैं ऐसे शिष्योंका अध्यात्मिक स्तर ४५ से ६९ % होता है । कनिष्ठ शिष्य जिसकी वृत्ति रजोगुणी या तमोगुणी हो, जो भोगमें लिप्त रहता हो या जिसकी वृत्तिसे आलसी हो, जिसका विवेक जागृत न हो, ऐसे शिष्यको गुरु अनेक वर्ष या जन्म शारीरिक श्रम अर्थात् सेवा करनेके पश्चात् ज्ञान देते हैं और कलियुगमें अधिकांश जीवोंका वर्ण शुद्र होनेके कारण ज्ञान प्राप्ति हेतु सेवा सर्वोत्तम साधन है, ऐसे शिष्योंका स्तर सामान्यत: ३० से ४५ % तक होता है ।
इसप्रकार ज्ञान किसे देना चाहिए इस सम्बन्धमें शिष्यकी पात्रताकी जांच कर उसे यथोचित ज्ञान देनेका शास्त्रीय विधान है और शास्त्रवचन अनुसार आचरण करना ही ज्ञानमार्गियोंका मुख्य धर्म होता है ।
मैंने तो यह पाया है कि वर्तमान कालमें लोगोंके तमोगुणी आचार-विचारके कारण उनके मन एवं बुद्धिपर अत्यधिक सूक्ष्म काला आवरण है; अतः अध्यात्मके गूढ तत्त्व तो जाने दें सरल तथ्योंको भी वे आत्मसात नहीं कर पाते हैं; इसलिए लेखन करते समय या सत्संग लेते समय मुझे इन सब तथ्योंका विशेष रूपसे ध्यान रखना पडता है; जिससे सर्वसामान्य व्यक्ति धर्मको चरण-दर-चरण समझ सके एवं जीवनमें उतार सके ।
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