कश्मीरमें चुन-चुन कर हिन्दुओंकी हत्या, काबुलके जैसे घाटीमें भी हो रहे अत्याचार !


८ अक्टूबर, २०२१
      नवरात्रिका पर्व आरम्भ होते ही कश्मीरमें हिन्दुओंका रक्त बहने लगा है । कुछ दिनों पूर्व इस बातकी आशङ्का जताई थी कि जो काबुलमें हो रहा है, वह एक दिन कश्मीरमें भी हो सकता है । अब वह आशङ्का सत्य प्रमाणित हो रही है । जबसे वहां कश्मीरी पण्डितोंकी सम्पत्तियोंसे अतिक्रमण हटानेका अभियान आरम्भ हुआ है, तबसे हिन्दुओंको चुन-चुन कर मारा जा रहा है । उन्हें कहा जा रहा है कि जो यहां रहनेके लिए आएगा, चाकरी (नौकरी) करने आएगा, विद्यालयमें अपने बच्चोंको पढाएगा, उसकी इसी प्रकारसे हत्या कर दी जाएगी ।
      आतङ्कवादी कश्मीरको सामान्य नहीं होने देना चाहते और इसके लिए वे पुनः वैसी ही परिस्थिति उत्पन्न करनेका प्रयास कर रहे हैं, जैसे आजसे ३१ वर्ष पूर्व की थी । उस समय कश्मीरी पण्डितोंको उनके ही घरोंसे विस्थापित कर  दिया गया था । १९ जनवरी १९९० की रात्रिको कश्मीरी पण्डितोंके सामने तीन विकल्प रखे गए थे । प्रथम ये कि वे इस्लाम स्वीकार कर लें । दूसरा ये कि वे कश्मीर छोडकर चले जाएं और तीसरा ये कि दोनों विकल्प नहीं चुननेपर मरनेके लिए सज्ज (तैयार) रहें ।
      इसके  पश्चात  रात्रिमें  लाखों  कश्मीरी  पण्डितोंको कश्मीर
छोडना पडा था । एक बार पुनः आतङ्कवादी और कट्टरपन्थी कश्मीरमें वैसे ही स्थिति बनाना चाहते हैं । जम्मू कश्मीरके उप राज्यपाल मनोज सिन्हाने भी इन हत्याओंपर चिन्ता जताई है और पूछा है कि इन हत्याओंपर मानव अधिकारोंके विजेता (चैम्पियन) आज मौन क्यों हैं ?
      सत्तालोलुप राजनेता अपनी सत्ता बनाए रखनेके लिए अलगावादियोंको शासकीय धनराशिपर उनका पालन  पोषण करते आए थे और वही अलगाववादी, घाटीमें आतङ्कको जन्म देनेमें पाकिस्तानकी सहायता करते थे । १९९० में जो हुआ, वह उस समयके शासनकी असफलता और सत्ताके मोहको स्पष्ट दिखता है; परन्तु परिस्थिति   आप पहले जैसे नहीं रही, सेनाके हाथ अब बन्धे नहीं है; अतः अब समय है कि आतङ्कियोंको चुन चुन कर मारा जाए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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