जिनके बच्चे आज्ञापालन नहीं करते, उनके पालकोंमें भी आज्ञापालनके संस्कार नहीं होते हैं !


मैंने पाया है कि जिनके बच्चे अपने पालकोंकी बात नहीं मानते हैं, उनके पालकोंमें भी आज्ञापालनके संस्कार नहीं होते हैं । उपासनाके आश्रममें गृहस्थ साधना हेतु आते ही रहते हैं, तो कुछ गृहस्थोंने कहा कि मेरे बच्चे मेरी कोई बात नहीं मानते हैं, अपनी मनमानी करते हैं । इसकारण उन्हें कष्ट होता है और हमें भी होता है ।
वे जब कुछ दिवस आश्रममें रहते हैं तो मुझे ज्ञात होता है कि उनमें भी आज्ञापालनका संस्कार नाम मात्र ही होता है । तो पालको ! जो गुण आपमें नहीं होगा, वह गुण आपके बच्चोंमें कैसे आएगा ?, आप सोचें !
कुछ पालक अपने माता-पिताकी इच्छाके विरुद्ध विवाह कर लेते हैं एवं विवाहके अनेक वर्ष पश्चात भी वे अपने माता-पिताके साथ नहीं रहते हैं तो बच्चों भी बडोंकी सेवा और सम्मान कैसे करना चाहिए ?, यह नहीं सीख पाते हैं । कुछ तो अपने माता-पिताको छोडकर परदेश या अपना गांव छोडकर चले जाते हैं और उन्हें अपने माता-पिताके प्रति जो कर्तव्य होता है उसका बोध ही नहीं होता है तो उनके भी बच्चोंमें जो अपने पालकोंके प्रति श्रद्धा होनी चाहिए वह नहीं होती है ।
और आजकलकी पीढीमें धर्म और साधनाका संस्कार न होनेके कारण वे वैसे ही वृत्तिसे स्वार्थी होते हैं तो उन्हें अपने पालकोंके मनको ठेस पहुंचानेमें या उनकी अवज्ञा करनेमें किंचित मात्रका भी दुःख नहीं होता है ।
इसलिए आज्ञाकारी बच्चे चाहिए तो स्वयंमें भी यह गुण आत्मसात करें एवं बच्चोंको धर्म और साधना सिखानेपर उनमें भी ये दिव्य गुण आ जाएंगे ।

– (पू.) तनुजा ठाकुर (संस्थापिका, वैदिक उपासना पीठ)



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