‘जेएनयू’का एक और राष्ट्रविरोधी कृत्य, हिन्दीके विरुद्घ शोध करनेके लिए दवाब बनाया !!


फरवरी १३, २०१९


जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय एक बार पुनः विवादोंमें आ गया है । ‘जेएनयू’के ३५ वर्षके एक शोधकर्ताने आरोप लगाया कि उसपर हिन्दी भाषाके विरुद्घ शोध करनेका दवाब बनाया जा रहा है । वह इस प्रकरणमें देहली उच्च न्यायालयका गया है। न्यायाधीश हरिशंकरने इस प्रकरणकी सुनवाई करते हुए विश्वविद्यालय और सहायक प्राध्यापकको अधिसूचना जारी की है और उनसे २३ अप्रैलतक उत्तर मांगा है ।

 

आशुतोष कुमार रॉय ‘जेएनयू’में ‘सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज’का ‘पीएचडी’ छात्र है । आशुतोष कुमार रॉयने अपने अधिवक्ता दिब्यांशु पांडेके माध्यमसे आरोप लगाया कि प्राध्यापकने मनमाने ढंगसे उनके शोधके पाठ्यक्रमको परिवर्तित करनेके लिए सुझाव दिया था । उन्होंने उससे हिन्दीके साम्प्रदायिक भाषापर शोध करने और इसका समर्थन करनेको कहा ।

 

अपनी याचिकामें आशुतोषने विश्वविद्यालयद्वारा पंजीकरणके लिए मना करने और ‘हिन्दी ब्लिक स्फियर (१८७०-१९७०)’ और राष्ट्रवादपर शोधकर बहसकेद्वारा हिन्दीकी छवि खराब करनेको लेकर जांचकी मांग की गई है । याचिकामें आशुतोषने ‘एक्टिंग सुपरवाइजर’ और अन्य लोगोंपर आरोप लगाया कि उन्होंने उनपर दबाव बनाया कि वो हिन्दीकी छवि खराब करनेको लेकर शोध करे और इसके अतिरिक्त हिन्दीके विद्वानोंके विरूद्ध भी ऐसा ही करे । उन्होंने कहा कि उन्हें अब पीएचडी भी करनेसे रोका जा रहा है । जो उनके मौलिक अधिकारोंका हनन और नियमोंके विरुद्ध है । याचिकामें कहा कि जेएनयू उनके पुराने पर्यवेक्षक (सुपरवाइजरके) त्यागपत्रके पश्चात उनके लिए नूतन पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) नियुक्त करे । ऐसा न होनेसे उनके उनकी शिक्षामें भी बाधा आ रही है ।

रॉयके शोध प्रारूपको जब ‘कमेटी ऑफ एडवांस स्टडी एंड रिसर्च’के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो प्राध्यापकने शोध प्रारूप अपने पास रख लिया और कहा कि यहां हिन्दीके पक्षमें शोध करनेके लिए कोई स्थान नहीं है, अच्छा होगा कि देहली विश्वविद्यालय चले जाइए और वहां जाकर भारतेंदु हरिश्चन्द्रका गुणगान करें !

 

“इस्लामिक देश भी हिन्दीको उसका स्थान देने लगे हैं; परन्तु हिन्दुओंके देशमें अब हिन्दीको साम्प्रदायिक भाषा बतानेको कहा जा रहा है ! ‘जेएनयू’ सदृश आतंक समर्थित विश्वविद्यालयमें पहले भी राष्ट्रविरुद्ध प्रकरण आ चुके हैं । यह समझसे परेय हैं कि जिन हिन्दुओंके करसे ये विश्वविद्यालय भिक्षापर चलते हैं, ये उन्हींके विरुद्घ विष उगलते हैं ! हिन्दी जिसकी वर्णमालाका एक-एक अक्षर शरीरके एक-एक कोशिका व मेरुतन्त्रसे सम्बन्धित है, जो सभी चक्रोंकी शक्तिको जागृत करनेकी क्षमता रखता है और जीवकी उन्नतिमें सहायक है, ऐसी वैज्ञानिक भाषाको भी कोई कर-करके कितना अपमानित करेगा ? हिन्दीको अपमानित करनेकी सोचना अर्थात स्वयंको ही अपमानित करना ! अब शासकवर्गको चिन्तन करनेका समय है कि ऐसे विश्वविद्यालयोंको सहायता देनी चाहिए अथवा नहीं ?”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

स्रोत : भास्कर



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