आजकल अनेक लोग ज्योतिषी बन जाते हैं । इसमें अधिकांश तो पहले अपने दुखोंका कारण जानने हेतु ज्योतिषियोंके चक्कर काटते हैं और यदि उन्हें कोई समाधान मिल जाता है तो वे स्वयं इसका अभ्यास करने लगते हैं या कहींसे इसका अध्ययनकर स्वयं ज्योतिषी बन जाते हैं । यह मैं सुनी-सुनाई नहीं, अपने व्यकितगत शोधके आधारपर कह रही हूं ।
ज्योतिष विद्या एक सूक्ष्म शास्त्र है, इसके अभ्यासकका आध्यात्मिक स्तर कमसे कम ६० % से ऊपर होना ही चाहिए अन्यथा ज्योतिष विद्याके माध्यमसे लोगोंको उपाय बतानेपर उन्हें भी सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट हो सकता है । वर्तमान कालमें ९० % अच्छे साधकोंको अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है और जो परा विद्यामें या सूक्ष्म अध्यात्मसे सम्बन्धित शास्त्रका प्रचार-प्रसार करते हैं, उन्हें यह कष्ट है ही । इससे ज्योतिषी वर्ग भी अछूता नहीं है । सूक्ष्म ज्ञानके पक्षको आजके शास्त्रसे दुर्लक्ष्य करनेके कारण अनेक लोग यह जाने बिना कि उनकी पात्रता उस विषयको सीखनेमें है या नहीं, इसके माध्यमसे जीविकोपार्जन करते हैं ! उपासनाके आध्यात्मिक उपाय केंद्रमें अनेक ऐसे लोग आये जिन्हें अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट था और उनका आध्यात्मिक स्तर ३५ से ५० % के मध्य था और वे ज्योतिषी थे, उन्हें जब हमने कोई और माध्यमसे जीविकोपार्जन हेतु कहा तो उनके कष्ट न्यून हो गए । प्रगत सूक्ष्म विज्ञान सम्मत ज्योतिष शास्त्रको इतना हल्का न समझें, यह मेरा सबसे अनुरोध है ! यदि आपके घरमें अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट या आध्यात्मिक कष्टकी तीव्रता अधिक है तो न ही इसका अभ्यासकर इससे सम्बन्धित उपाय बताएं और न ही इसे जीविकोपार्जनका माध्यम बनाएं ।
हिन्दू राष्ट्रमें ऐसे सभी विधाओंको कौन अपना सकता है ?, इसके विषयमें पाठ्यक्रमोंमें जानकारी दी जाएगी, जिससे कौन इसे अपनी जीविकोपर्जनका माध्यम बना सकता है, यह विद्यार्थियोंको ज्ञात हो सके । शीघ्र ही इस विषयके अन्य तथ्योंको उजागर करने हेतु धर्मधारामें एक सत्संग लेनेपर विचार कर रही हूं । – तनुजा ठाकुर
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