भाषाका चैतन्य बनाए रखने हेतु कारकचिन्हको धातुसे जोडें !


संस्कृतमें कारकचिन्हको धातुसे जोडा जाता है | संस्कृत भाषामें सर्वाधिक चैतन्य है, इसलिए आजके आधुनिक विज्ञानने इसका उपयोग करना आरम्भ कर दिया है और इस भाषाकी वैज्ञानिकता एवं गरिमाको तो आज नासाके वैज्ञानिक भी मान्य करने लगे हैं एवं वैज्ञानिकोंको वहां संस्कृत सिखाई जाती है ।
इस भाषाके निकट जो भी भाषा होगी, वह चैतन्यमय होगी; अतः हिन्दी भाषाको चैतन्यमय बनाने हेतु उसे संस्कृतनिष्ठ बनाएं । ‘गीता प्रेस’के ग्रंथोंमें भी कारकचिन्हको धातुसे जोडा जाता है । जब इसका कारण सनातनके एक साधक श्री दुर्गेश सामन्तने, गीता प्रेस, गोरखपुरके एक प्रमुख अधिकारीसे पूछा तो उन्होंने कहा संस्कृतमें हम ‘रामस्य धनुष:’ लिखते हैं; इसलिए रामका धनुष लिखना ही उचित है।  ‘राम का धनुष’ लिखनेका अर्थ है रामको धनुषसे दूर करना । उच्चारण अनुसार भी रामका धनुष उचित है; क्योंकि हम रामका साथमें बोलकर धनुष कुछ अन्तराल पश्चात् बोलते हैं ‘काधनुष’ नहीं बोलते हैं । जैसे हम बोलते हैं वैसे ही लिखना उचित है।  वैदिक साहित्यका संस्कृतनिष्ठ हिन्दीमें प्रचार-प्रसार करने हेतु हम गीता ‘प्रेस, गोरखपुर’का मन:पूर्वक अभिनन्दन करते हैं |   – वैदिक उपासना पीठ



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