कर्म अकर्म


कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌ ॥
अर्थ  : जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है॥- श्रीमदभगवाद गीता (4:18)
भावार्थ : जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है अर्थात जो कर्म तो करता है परंतु उसके कर्मफल से अलिप्त रहता है अर्थात अकर्ता होकर कर्म करता है ऐसे कर्मयोगी का कर्म अकर्म होता है और जो आत्मज्ञानी होने के पश्चात भी कर्मरत रहता है अर्थात यह विश्व कर्म प्रधान है अतः सर्व विषय वासनाओं से मुक्त होकर भी जो कर्म करता रहता है अकर्म में कर्म को देखते हुए करता है |

-तनुजा ठाकुर

 



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