कार्यकर्ता, जिज्ञासु, साधक, अच्छे साधक एवं शिष्य !


    कुछ जिज्ञासु किसी संतसे जुडनेपर स्वयंको उनका शिष्य संबोधित करने लगते हैं जबकि वे आध्यात्मिक दृष्टिसे इस पदवीसे कोसों दूर होते हैं ! तो शिष्यसे पहले कौन-कौनसे चरण होते हैं यह जानना आवश्यक है ! यह मैं इसलिए बता रही हूं कि आप भी अंतर्मुख होकर आप किस चरणमें है यह देखें !  तो गुरुके पास जो भक्तोंका गुट होता है उसे पांच श्रेणीमें विभाजित किया जा सकता है ! प्रथम कार्यकर्ता, द्वितीय जिज्ञासु, तृतीय साधक, चौथे अच्छे साधक एवं पांचवा शिष्य ! अब आपको इनकी विशेषता बताती हूं, इन्हें अंतर्मुख होकर पढकर अपना वर्गीकरण स्वयं कर लें !
    सबसे निचले क्रमांकपर होते हैं कार्यकर्ता – ये मात्र कार्य करने हेतु इच्छुक होते हैं, इन्हें साधना करनेकी इच्छा नहीं होती है, वे यदि साधना करते भी हैं तो मनानुसार करते हैं ! अर्थात गुरुसे तो किसी कारणवश जुड जाते हैं किन्तु वे साधना वही करते हैं जो उनके मनको अच्छा लगता हो ! ऐसे कार्यकर्ता सामान्यत: किसी स्वार्थवश किसी संतसे जुडते हैं ! ऐसे सदस्य व्यक्तिनिष्ठ होते हैं ! मात्र जब गुरु कहे तो ही ये कुछ करते हैं, वह भी आज्ञापालन मानकर नहीं करते हैं, उन्हें जितनी इच्छा होती है उतना ही करते हैं ! ऐसे सदस्यका सेवामें सातत्य नहीं होता ! ये आसक्त एवं भावनाप्रधान होते हैं ! चूकें बतानेपर वे कदापि उसे स्वीकार नहीं करते हैं,  अनेक बार वे संतोंमें ही चूक निकाल देते हैं ! चूक होनेपर यदि उन्हें दृष्टिकोण दिया जाए तो उन्हें त्वरित साधना, गुरु व ईश्वरके विषयमें विकल्प आ जाता है ! उनकी इच्छा हो तो वे कभी सेवा करते हैं कभी नहीं करते हैं ! अनेक बार वे गुरुके साधकोंसे अर्थलाभ हेतु या सामजिक प्रतिष्ठा हेतु या अन्य कोई स्वार्थसिद्धि हेतु ही संतसे जुडते हैं !  कार्यकी दृष्टिसे सन्त उन्हें अपने पास रखते हैं या कार्य करते करते क्या पता उनका विवेक जाग्रत हो जाए और उनमें कुछ परिवर्तन आना आरम्भ हो जाए इसकारण भी रखते हैं !
    कार्यकर्तासे अगले क्रमांकपर होते हैं जिज्ञासु – ये साधक और कार्यकर्ताके मध्यके होते हैं ! इनमें थोडे अवगुण कार्यकर्ताके होते हैं और थोडे गुण साधकके होते हैं ! इन्हें अध्यात्ममें थोडी जिज्ञासा होती है यह उनकी विशेषता उन्हें कार्यकर्तासे आगेकी श्रेणीमें रखती है और उनसे थोडे प्रमाणमें आज्ञापालन भी होता है | अर्थात वे तन, मन धनसे या मात्र इनमेंसे किसी एकसे साधना करनेका प्रयास करते हैं ! ये अध्यात्ममें आगे जा सकते हैं ! इन्हें गुरुके प्रति विश्वास होता है किन्तु उनकी बातोंपर संशय भी रहता है !
    उसके अगले क्रमांकपर है साधक – ये गुरुके बताए अनुसार साधना करनेका प्रयास करते हैं | इसे नियमित भी करनेका प्रयास करते हैं ! साधना करनेके कारण इन्हें अनुभूतियां होती हैं फलस्वरूप इन्हें गुरुके प्रति श्रद्धा होती है ! ये अच्छे साधकोंसे सीखकर आगे जा सकते हैं !
    उसके अगले क्रमांकपर होते  हैं अच्छे साधक – ये अपने तन, मन, धन व बुद्धिसे सातत्यसे सेवा करते हैं, प्रतिदिन दोष निर्मूलन एवं अहम् निर्मूलन हेतु प्रयास करते हैं | घरपर अपनी सेवा संभालते हुए पांचसे सात घंटे व्यष्टि करते हुए समष्टि सेवा करते हैं ! या आश्रममें भी रहकर सेवारत होते हैं ! इनमें भाव होता है, गुरुके आध्यात्मिक दृष्टिकोण देनेपर भी इन्हें विकल्प नहीं आता है ! इनमें स्वार्थकी वृत्ति नहीं होती है और इनका भाव और त्याग बहुत अच्छा होता है अर्थात मुझे मात्र अध्यात्ममें आगे जाना है यह प्राप्त करनेकी इच्छा होती है ! ये आगे शिष्य बन सकते हैं !
    सबसे शीर्षपर होता है शिष्य – जो अपना सर्वस्व गुरुको अर्पण कर मात्र गुरुकार्य हेतु ही जीवित रहता है उसे शिष्य कहते हैं, ऐसे शिष्य पूर्णकालिक साधक होते हैं ! उनके लिए गुरु आज्ञा वेद-वाक्य होता है ! सांसारिक आसक्तिसे मुक्त होकर वह गुरु चरणोंमें रहकर मात्र अपने गुरु और गुरुकार्यका ही विचार कर सर्व कृत्य करते है !
     तो आप सोच रहे होंगे कि गुरु सबको साधक या शिष्य क्यों कहते हैं ?, वह बोली भाषामें गुरु कहते हैं ! वस्तुतः जैसी साधककी भक्ति होती है, गुरु वैसा ही कार्य करते हैं !
     अब आप अपना श्रेणी स्वयं निर्धारित कर लें | स्वयंको किसी गुरुका शिष्य कहनेसे पूर्व अपनी पात्रताके विषयमें अवश्य ही आत्मविश्लेषण करें !


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