राष्ट्रनिष्ठ दलोंसे निराश होकर कश्मीरी पण्डितोंने बनाया नूतन राजनीतिक दल, प्रथम बार विधानसभा उम्मीदवार होंगे प्रवासी कश्मीरी पण्डित !!


अप्रैल २९, २०१९

 

लगभग ३ दशकोंतक प्रवासी रहनेके पश्चात अब प्रवासी कश्मीरी पण्डित समुदाय जम्मू कश्मीरमें आगामी विधानसभा चुनावोंमें न्याय और सम्मानकी लडाई लडनेके लिए सज्ज हैं । इस समुदायने एक राजनीतिक दल बनाया है । प्रवासी कश्मीरी पण्डितोंने न्यायके लिए लडने और निर्वासित कश्मीरी पण्डित समुदायके पुनर्वासके लिए उच्चतम न्यायालयके वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक भानकी अध्यक्षतामें ‘कश्मीरी पण्डित राजनीतिक कार्यवाही समिति’ नामक एक राजनीतिक दल बनाया है । संगठनने अपने दलके लिए समर्थन एकत्र करनेके लिए देश भरमें सदस्यता अभियान भी आरम्भ किया है ।

समाचारके अनुसार, ‘कश्मीरी पण्डित राजनीतिक कार्यवाही समिति’ (KPPAC) जम्मू और कश्मीरमें आगामी विधानसभा मतदानमें कई निर्वाचन क्षेत्रोंमें प्रत्याशियोंको उतारनेके लिए सज्ज है । यद्यपि, यह प्रथम बार होगा, जब जम्मू कश्मीरके विधानसभा मतदानमें प्रवासी कश्मीरी पण्डित समुदायको प्रत्याशीके रूपमें उतारा जाएगा ।

‘केपीपीएसी’के उपाध्यक्ष सतीश महालदारने कहा कि वो मतदानमें प्रत्याशियोंको उतारनेकी योजना बना रहे हैं और साथ ही अन्य राजनीतिक दलोंसे भी गठबन्धनकी मांग कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीरके अधिकांश राजनीतिक दल लोगोंके साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे हैं । सतीश महालदारका कहना है कि मतदान विजयी होनेके लिए दलोंकेद्वारा प्रलोभन देना उन्हें अस्वीकार्य है । वो कहते हैं कि हम मानव हैं और हमसे आदरसे व्यवहार होना चाहिए ।

दलके द्वारा चलाए जा रहे सदस्यता अभियानके बारेमें महालदारने कहा कि इसके लिए नामांकन प्रक्रिया पहलेसे ही आरम्भ है और वो कश्मीरके भीतर गठबन्धन करनेवाली साझेदारोंकी खोजमें हैं । उन्होंने कहा कि उनके दलमें केवल कश्मीरी पण्डितोंको ही नहीं, वरन लद्दाख, कश्मीरी मुसलमानों, सिखों और अन्य लोगोंको भी सम्मिलित होनेके लिए आमन्त्रित किया जाता है । वो कहते हैं कि वो न्यायके लिए लड रहे हैं और यह राजनीतिक विचारधारा है । वो कश्मीरमें सभी समुदायोंके लिए लडेंगें ।

उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर राज्य राष्ट्रपति शासनके अधीन है । जम्मू कश्मीरमें भाजपा और पीडीपीके गठबन्धनका शासन था; परन्तु गत वर्ष जूनमें पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्तीके साथ हुए मतभेदके पश्चात भाजपा शासनने अपना समर्थन वापस ले लिया था, जिसके कारण जम्मू कश्मीरमें शासन गिर गया और ६ माहके राज्यपाल शासनके पश्चात गत वर्ष दिसम्बरमें यह राज्य राष्ट्रपति शासनके अधीन हो गया ।

 

“सभी राष्ट्रद्रोही और राष्ट्रीय दलोंसे आशाएं टूटनेके पश्चात अन्ततः कश्मीरी पण्डितोंको स्वयं ही लडनेके लिए आगे आना पडा । वास्तवमें तो प्रत्येकको अपने अधिकारोंके लिए स्वयं ही लडना पडता है; परन्तु कश्मीरी पण्डितोंका यह पग राष्ट्रनिष्ठ दलोंके लिए लज्जाकी बात है । राष्ट्रनिष्ठ दल अनेकानेक वचन देनेके पश्चात भी कश्मीरी पण्डितोंके लिए कुछ न कर पाएं । वैसे इस मुस्लिम बहुल राज्यमें दलको अधिक सफलता मिलेगी, इसकी आशा अल्प ही है; अतः अब कश्मीरी पण्डितोंको अपने अधिकार हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनापर ही मिलेंगें, इतना अवश्य है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : ऑप इण्डिया



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