मूल रूपसे ये दक्षिण पूर्व ‘एशिया’के उष्णदेशीय क्षेत्रके हैं I इसकी खेती सम्पूर्ण उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रोंमें की जाती है । केला खानेके सन्दर्भमें युगांडा प्रथम स्थानपर है, जहां एक व्यक्ति प्रतिवर्ष लगभग २२५ केले खा जाता है । मुख्य रूपसे इस फलके लिए इसकी खेती की जाती है और कुछ सीमातक रेशोंके उत्पादन और सजावटी पौधेके रूपमें भी इसकी खेती की जाती है । यद्यपि केलेके पौधे बहुत लम्बे और सामान्य रूपसे अत्यधिक ठोस और सुगठित होते हैं और प्रायः चूकवश वृक्ष समझ लिए जाते हैं; परन्तु उनका मुख्य और सीधा तना वास्तवमें एक छद्मतना होता है । कुछ प्रजातियोंमें इस छद्मतनेकी ऊंचाई २ से ८ ‘मीटर’तक और उसकी पत्तियां ३ से ४ ‘मीटर’तक लम्बी हो सकती हैं । प्रत्येक छद्मतना हरे केलोंके एक गुच्छेको उत्पन्न कर सकता है, जो पकनेके पश्चात पीले या कभी-कभी लाल रंगमें परिवर्तित हो जाते हैं । फल लगनेके पश्चात छद्मतना नष्ट हो जाता है और इसका स्थान दूसरा छद्मतना ले लेता है ।
केलेके फल लटकते गुच्छोंमें ही बडे होते है, जिनमें २० फलोंतककी एक पंक्ति होती है (जिसे हाथ भी कहा जाता है) और इसका भार लगभग ३० किलोतक होता है । एक फल साधारणतः १२५ ‘ग्राम’का होता है, जिसमें लगभग ७५% पानी और २५% सूखी सामग्री होती है। प्रत्येक फलपर (केला या ‘ऊंगली’के रूपमें ज्ञात) एक सुरक्षात्मक बाहरी मोटी परत (छिलका या त्वचा) होती है, जिसके भीतर एक मांसल खाद्य भाग होता है ।
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