पति या पत्नीने, एक दूसरेकी साधनामें अवरोध निर्माण नहीं करना चाहिए ! इससे वे महापापके भागी होते हैं और इससे लेन-देन (नूतन कर्मफल या संचित) निर्माण होते हैं, जो जन्म-जन्मान्तर चलते हैं । जैसे इस जन्ममें यदि किसी स्त्रीके पतिने उसके साधनामें अवरोध निर्माण किया हो और साधना पथसे विमुख करने हेतु विवश किया हो तो अगले जन्ममें या जिस भी जन्ममें वह साधना करने हेतु इच्छा करेगा तो वह पत्नी किसी न किसी माध्यमसे अपनी पतिके साधनामें अवरोधक बनकर सामने आ जाएगी ! और यह क्रम अनेक जन्मों तक चलता रहता है ! साथ ही जो भी किस साधक जीवको साधनामें आगे जानेसे रोकता है वह ईश्वरकी दृष्टिमें असुर समान ही होता है । जैसे ध्रुवकी साधनामें उसके पिता हिरण्यकश्यपु बने थे और भगवानने उसे दण्ड दिया था । ध्यान रहे, साधना करना, यह प्रत्येक प्राणी मात्रका नैसर्गिक अधिकार है । जब कोई भी जीवके इस मौलिक अधिकारमें हस्तक्षेप करता है तो वह ईश्वरीय विधान अनुसार दण्डका पात्र बनता है और साथ ही वह अपने कर्मफलका भोग भी भोगता है ! ऐसेमें अपने क्रियामाणसे यह प्रयास करना चाहिए कि यदि हमसे साधना नहीं होती है तो हम किसीकी साधनामें अवरोधक तो न बनें ! कोई भी व्यक्ति अहंकार और अधिकारवश किसीको साधनामें रोकता है; किन्तु यह अधिकार जो उस सम्बन्धमें होता है, वह ईश्वर प्रदत्त होता है । जब हम ईश्वर प्रदत्त अधिकारका दुरुपयोग करते हैं तो ईश्वर अगले जन्ममें हमें अधिकारहीन कर देते हैं, यह भी ध्यान रखें ।
आपमेंसे कुछ व्यक्तिको यह विचार आ रहा होगा कि यदि पतिने पत्नीकी साधनाके मार्गमें अवरोध निर्माण किया और पत्नीने मीरा बाई समान संन्यास लेकर जीवनमुक्त हो गई तो ऐसेमें पतिको अपनी पत्नीसे अगले जन्ममें कैसे अवरोध मिलेगा ? ऐसी स्थितिमें जिस जन्ममें भी उसे साधना करनेकी इच्छा हुई, उस जन्ममें उसके संचित अनुसार किसी न किसीसे अवरोध अवश्य मिलेगा और साधनामें अडचनें निर्माण करनेवालेके कारण उसका अमूल्य मनुष्य जीवन व्यर्थ हो जाएगा और मानसिक सन्ताप भी होगा ! यह तथ्य मात्र पति-पत्नीपर ही नहीं, सभी सम्बन्धोंपर लागू होता है; इसलिए कभी भी किसीकी साधनामें अवरोधक बनकर अपने लिए नूतन पापकर्म और संचित निर्माण न करें !
और न ही किसीकी भावनामें आकर साधना छोडें; क्योंकि यदि आज कोई आपका पति है तो अगले जन्ममें कोई और आपका पति होगा, ये सम्बन्ध नश्वर, अस्थायी और हमारे कर्मफलपर आधारित होते हैं । पूर्वके युगोंमें सम्बन्ध, साधना हेतु पूरक होते थे, कलियुगके अंतिम चरण तक हमारे अधिकांश सम्बन्ध दुःखदाई होंगे; क्योंकि उस सम्बन्धके अधिकांश पुण्य कर्म, हम पूर्वके युगोंमें भोग चुके होते हैं ! यह मैं आपको क्यों बता रही हूं; क्योंकि मैंने बहुतसे साधकोंको अपने परिवारवालोंसे अवरोध निर्माण करनेपर साधना छोडते हुए देखा है ! इसलिए आज यह सब सुस्पष्टतासे बता रही हूं ! कलियुगके प्रथम चरण अर्थात मात्र ५००० वर्ष पूर्ण होनेपर हमें अधिकांश सम्बन्धोंसे कितना दुःख मिलता है, इसका विवेचन करें तो जैसे-जैसे कलियुगका समय व्यतीत होना, सम्बन्धोंसे कष्टका प्रमाण बढता ही जाएगा यह सरल सा तथ्य धयान रखें ! एक बार एक सन्तने कहा था, कलियुगके सर्व सम्बन्ध अधिकांशत: दुखदाई होते हैं । इसलिए इसी जन्ममें साधना कर जीवनमुक्त हो सकें, यह संकल्प लेकर साधना करें और भावनामें बहकर साधनाको कदापि न त्यागें ! यदि आपका परिवार आपकी साधनामें अवरोधक है और आप उस कुटुम्बका त्याग करते हैं तो आपको यह सम्पूर्ण विश्वका कुटम्बका आधार मिल जाता है । जब आप साधनासे विमुख करनेवाले परिजनोंका त्याग करते हैं तो आपको कुछ कालके लिए उनसे भावनात्मक सम्बन्ध होनेके कारण दुःख हो सकता है; किन्तु जब आप साधना करने लगते हैं तो भाव निर्माण होता है और आप सुख व दुःख दोनोंसे परेकी अवस्था अर्थात आनंद अवस्थाकी अनुभूति ले सकता हैं और साधनामें सातत्य होनेपर भावातीत अवस्था तक पहुंच सकते हैं !; अतः साधना किसी भी परिस्थतिमें न त्यागें ! – तनुजा ठाकुर
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