कर्म तीन प्रकारके होते हैं – संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण |
संचितका अर्थ है, पिछले सभी जन्मोंके कर्मका सम्पूर्ण या कुलयोग | उन कर्मोंसे एक छोटा सा अंश जो हम इस जन्ममें लेकर भोगने हेतु आते हैं, उसे प्रारब्ध कहते हैं ! जैसे कोषागारमें (बैंकमें) एक चालू खाता और एक बचत खाता होता है, वैसे ही प्रारब्ध चालू खाता है और संचित बचत खाता होता है | हम अपनी साधनासे ही संचितको नष्ट कर सकते हैं अन्यथा उसे भोगने हेतु बार-बार जन्म लेना पडता है और यह योग्य साधना न करनेपर बढता ही रहता है | इन दोनों कर्मोंके अतिरिक्त एक और कर्म होता है, जिसे हम क्रियमाण कर्म कहते हैं | हमारे श्रीगुरुने बताया है कि कलियुगमें अध्यात्मशास्त्रके अनुसार हमारे जीवनका ६५% प्रारब्धसे तथा शेष ३५% क्रियमाण कर्मसे नियंत्रित होता है । किंतु अच्छी बात यह है कि अपने ३५% क्रियमाण कर्मसे उचित साधना करके ६५% प्रारब्धपर विजय प्राप्त कर सकते हैं या उसकी तीव्रताको न्यून कर सकते हैं !
क्रियमाण कर्म किसे कहते हैं ? जो हमारे हाथमें नहीं होता, उसे प्रारब्ध कहते हैं । जीवनका जो भाग हमारे नियंत्रणमें हो, उसे क्रियमाण कर्म कहते हैं । हम प्रतिदिन नूतन कर्म करते हुए संचितमें अपने कर्मोंके कुलयोगको बढाते रहते हैं; इसलिए कर्मोंके इस बन्धनसे निकलना कठिन होता है और हम जन्म और मृत्युके इस चक्रसे बिना योग्य साधनाके निकल नहीं पाते हैं ! इस साधना रूपी कर्मको पुरुषार्थ कहते हैं और इसप्रकार कर्तापनके साथ अपने विवेकसे निर्धारितकर योग्य कर्म करना या जानते हुए या अज्ञानतामें अयोग्य कर्म करना सब क्रियमाण कर्म है | प्रारब्धपर हमारा वश नहीं होता; इसलिए उस कर्मकी ओर हम स्वतः ही अग्रसर हो जाते हैं ! जैसे प्रतिदिन कोई व्यक्ति एक मार्गसे जाता हो और एक दिन अकस्मात उसने दूसरे मार्गसे जानेका निश्चय किया और उस मार्गपर हुई दुर्घटनामें उसकी मृत्यु हो जाती है अर्थात उसकी मृत्यु उसे उस मार्गपर लेकर जाती है, ऐसा समझ सकते हैं !
Leave a Reply