कुछ लोग क्रियायोगके अनुसार साधना करते हैं; क्रियायोगकी साधना कभी भी अपने मनसे या ग्रन्थ पढकर या किसीसे सुनकर या कहींसे देखकर, कभी नहीं करनी चाहिए ! इस योगमार्गके अनुसार, साधना मात्र योग्य गुरुके शरणमें रहकर ही सीखनी चाहिए, अन्यथा अनर्थ भी हो सकता है; क्योंकि यह सब छ: सूक्ष्म चक्रोंके जागृत करने सम्बन्धी शास्त्र है, यदि एक भी चक्रकी शक्ति अधिक जागृत हो गई और उसकी शक्ति योग्य दिशामें प्रवाहित नहीं हो पाई तो व्यक्ति विक्षिप्त तक हो सकता है ! सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि योगमार्गको करते समय प्रदूषित वायु एवं भोजनसे पूर्णत: बचना चाहिए और इन्द्रियोंका निग्रह करना चाहिए ।
मैं ख्रिस्ताब्द २००० में अयोध्या (फैजाबाद) जनपदमें एक क्रियायोगीसे मिली थी । हमें कोई साधक उनसे मिलवाने ले गए थे, उनसे मिलनेपर मैंने देखा कि उनका मुख तेजसविहीन था । मैंने उनसे कहा, “आपका मुख देखकर लगता है कि आपकी प्राणशक्ति बहुत अल्प (कम) है !” सामान्यत: क्रिया योगीके मुखपर अत्यधिक तेज या शक्ति होती है । उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “दो वर्षोंसे क्षयरोगका (टीबीका) रोगी रहा हूं, अभी दो माह पूर्व ठीक हुआ हूं ।” मैंने कहा, “मैंने सुना है कि आप क्रिया योगका प्रसार करते हैं, तब इस रोगसे आप कैसे ग्रस्त हो गए ?” उन्होंने कहा, “मैं गुजरातके सूरत जनपदमें छ: वर्ष रहा था, एक उद्योगपतिने अपने उद्योगके पास ही पडे रिक्त स्थानपर मुझे रहनेकी अनुमति दे दी थी, मैं भी एकान्त क्षेत्र देखकर वहां अपनी पत्नीके साथ रहने लगा और क्रिया योगकी साधना करने लगा; किन्तु चार वर्षोंके पश्चात मुझे क्षयरोग हो गया और वह इतनी भयंकर स्थितिमें पहुंच गया कि मैं मरणासन्न हो गया !
मैं एक योगीसे कभी-कभी मार्गदर्शन लेता था; जब मेरे बचनेकी आशा समाप्त होने लगी तो मैं उनके पास गया और उनसे पूछा कि मेरी साधनामें कहां कमी रह गई, जो मुझे यह रोग हो गया ?, तो उन्होंने कहा कि तुम्हारे शरीरमें उद्योगसे निकलनेवाली विषाक्त वायु इस प्रकार संक्रमित हो चुकी है कि वह अब प्राणघातक बन चुकी है । सबसे पहले तुम यहांसे किसी ऐसे स्थानपर जाओ, जहां वायुमें अंशमात्र भी प्रदूषण न हो, इसलिए मैं यहां आ गया हूं ।”
वे योगी उस समय जहां रह रहे थे, वह नगरसे दूर एक गांव था और वह स्थान भी एकान्त और प्रदूषणरहित था ! उन्होंने कहा, “मैं मूर्ख चार-चार घण्टे क्रिया करता था; किन्तु वह एक औद्योगिक क्षेत्र है और उस स्थानकी वायु प्रदूषित है, यह मुझे ध्यानमें ही नहीं आया ।” अर्थात अपने मनसे क्रिया योग करते समय आपसे कहां चूक हो रही है ?, यह आपको बहुत विलम्बसे समझमें आता है !
कुछ लोग पंद्रह मिनिट या आधे घण्टे क्रिया योगकी साधना बीस वर्षोंसे करते हैं; किन्तु यह साधना नित्य बढानी चाहिए और यदि आप इस क्रियाको नियमित आठ-दस घण्टे करते हैं तो ही उसमें कुछ परिणाम दिखाई देगा; क्योंकि यह एक प्रकारका हठयोग है; अतः इसमें धैर्य और सातत्यकी अत्यधिक आवश्यकता होती है ।
एक बार मैं एक अत्यन्त वृद्ध क्रिया योगीसे मिली थी, उनकी आयु सौ वर्षसे भी अधिक थी; उन्होंने अनेक वर्ष हिमालयमें रहकर क्रिया योगकी साधना की थी, अनेक हिमालयके योगियोंसे उनका साक्षात्कार हुआ था, किन्तु उन्हें आत्म-साक्षात्कार नहीं हुआ; अन्तत: उन्होंने भक्तिके मार्गको चुना; क्योंकि उन्हें साधनासे जो आत्म तृप्ति मिलनी चाहिए, वह नहीं मिली थी ! उनका आध्यात्मिक स्तर ६५ % है अर्थात इतने वर्ष कठोर साधना करनेपर भी वे सन्त पदको साध्य नहीं कर पाए थे ! क्रिया योगमें यदि सातत्य हो तो भी उससे शीघ्र प्रगति तभी सम्भव है, जब साधकपर किसी उच्च कोटिके गुरुका वरद हस्त हो और कलियुगमें क्रिया योगके सन्त या गुरु मिलने दुर्लभ हैं ! कुछ अध्यात्मविदोंने क्रिया योगके माध्यमसे सम्पूर्ण विश्वमें साधनाका प्रसार किया; किन्तु आज उनकी संस्थामें उच्च कोटिके गुरु या मार्गदर्शक नहीं हैं ! सामान्यत: क्रिया योगी साधक समष्टिमें नहीं रहते हैं; किन्तु यह विधा जीवित रहे; इसलिए वे कभी-कभी समाजमें आकर इसका प्रसार करते हैं ।
वंदन।
योग्य गुरु कैसे मिलेंगे ?, क्या हमारी पात्रता विकसित होने पर वे स्वयं हमें ढूंढ लेंगे, या हमें गुरू की खोज करनी चाहिये ?