आज अधिकांश माता-पिता अपने बच्चोंको साधनासे इसलिए दूर रखते हैं, क्योंकि उन्हें भय होता है कि कहीं वह पूर्ण कालिक साधक या संन्यासी न बन जाएं । ऐसे स्वार्थी माता-पिताको अपने बच्चोंके प्रारब्धकी तीव्रताके कारण जीवन पर्यन्त दुःख, तनाव एवं क्लेशमें रहना पडता है, क्योंकि एक आसक्त पालकके लिए अपने बच्चोंका कष्ट सबसे अधिक असह्य होता है । कलियुगमें विरले व्यक्तिके प्रारब्धमें सुख ही सुख होता है । कलियुग दुःख भोगनेका काल है !
हिन्दू पालको ! आपकी सन्तानें पूर्णकालिक साधक या संन्यासी बनकर आनन्दमें रहे, यह अधिक उपयुक्त है या आजीवन अपने कष्टोंसे आपको त्रस्त करे एवं स्वयं भी क्लेशमें रहे, इसमेंसे अधिक श्रेष्ठ क्या है ?, इसका निर्धारण स्वयं करें और अपने बच्चोंका योग्य पथ-प्रदर्शक बनकर उनका और स्वयंका कल्याण करें ! कुपुत्रसे एक पूर्ण समय साधना करनेवाला पुत्र अधिक योग्य होता है ।
Leave a Reply