कुत्ते-बिल्ली जैसे पशुओंको घरमें अपने साथ कक्षमें रखनेसे वास्तुमें अशुद्धि कैसे फैलती है ? (भाग – ३)


घरमें यदि अतिरिक्त कक्ष या स्थान न हो तो कुत्ते-बिल्ली जैसे पशुको अपने घरमें न रखें और यदि रखते हैं तो उसे घरमें प्रवेश न दें, इससे घरमें अपवित्रता निर्माण होकर वास्तुदोष लगता है, इसपर ‘फेसबुक’पर श्री प्रशान्त वर्माने एक प्रश्न पूछा है कि भगवानके लिए सभी प्राणी समान होता है तो कुत्ता-बिल्ली जैसे पालतू पशुके घरके भीतर रहनेसे घर अपवित्र कैसे हो सकता है, यदि ऐसा है तो यह नियम मनुष्योंपर भी लागू होना चाहिए ?

उत्तर : “जब बचपनमें हमें (भाई-बहनोंको), हमारे पिताजी कुत्तेको घरमें नहीं लाने देते थे तो एक दिवस मैंने जिज्ञासावश पूछा उनसे पूछा, “यदि कुत्तेको घरमें लाकर रखेंगे तो क्या होगा ?” उन्होंने कहा, “वह पशु है, उसे कितना भी प्रशिक्षित किया जाए, वह घरके भीतर मल-मूत्र कभी-कभी त्याग करेगा ही तो मुझे उसे उठाना पडेगा और इसके पश्चात मेरा जनेऊ अशुद्ध हो जाएगा और उसे परिवर्तित करना पडेगा और यह बार-बार या प्रतिदिन करनेके लिए समय निकालना होगा । मेरे माताजी और पिताजीको मैंने कर्मकाण्डके कठोर नियमोंका पालन करते हुए देखा था और आज यदि मैं धर्मके कुछ पक्षको आपको बता पाती हूं तो यह उनकी भी शिक्षाका परिणाम है । (आपको बता दें आज अनेक जन्म-ब्राह्मण यज्ञोपवितके कठोर नियमोंका पालन नहीं कर पाते हैं या ऐसा कहना उचित होगा धर्माभिमान एवं धर्मप्रेमके अभावमें उसके पालन हेतु कष्ट नहीं उठाना चाहते हैं; इसलिए उसे धारण ही नहीं करते हैं और आजके अनेक माता-पिता ‘उपनयन संस्कार होना चाहिए’; इसलिए करवा देते हैं और कुछ ही दिवस उपरान्त ‘उसके नियमोंका पालन कौन करे’, यह सोचकर कई युवा जन्म-ब्राह्मण उसे उतार देते हैं, यहां मैं जन्म ब्राहमण इसलिए बार-बार लिख रही हूं; क्योंकि जो वर्ण ब्राह्मण होते हैं, उनके लिए यह सूत्र उनके प्राणोंसे भी प्रिय होता है और यह पवित्र सूत्र उपनयन संस्कारके पश्चात उसके देहावसानके साथ ही जाता है, मेरे कटु शब्दोंके लिए क्षमा करें मुझे, किन्तु मैंने अनेक जन्म ब्रहामणोंको इसका महत्त्व बताकर प्रायश्चित करवा कर, इसे धारण करवाया है; अतः आज इस वस्तुस्थितिको इस प्रकार लिख सकती हूं और यह देखकर मुझे बहुत दुःख भी होता है ।)
पिताजीकी अडचन जानकर मैंने झटसे कहा, तो मां उठा देंगी तो पिताजीने कहा, उन्हें भी केश धोकर स्नान करना होगा, वे कर्मकाण्ड अनुसार बहुतसे व्रत-त्योहार करती हैं, ऐसेमें पूजा पूर्व उस पशुके स्पर्शसे शरीर अशुद्ध होनेसे उन्हें पुनः स्नान करना पडेगा; साथ ही वह यदि पूजा घरमें चला गया तो वह भी अशुद्ध हो जाएगा; उसके पश्चात् हमें उस कक्षकी भी शुद्धि करनी होगी; इसलिए हम कुत्तेको घरमें नहीं रख सकते हैं । हम कर्मकाण्डी परिवारसे थे; अतः उनका कहना मैं मान तो गई किन्तु कुत्तेके स्पर्शसे या उसे शौचसे हमारा शरीर या पूजा घर अशुद्ध हो जाएगा और उसके स्पर्शके पश्चात पूजा नहीं कर सकते हैं, ऐसा क्यों ?, यह प्रश्न मेरे मनमें रह गया । इसका उत्तर जब मैं श्रीगुरुसे जुडी तो ज्ञात हुआ !
वस्तुत: कर्मकाण्डकी साधना फलित होने हेतु शरीरकी शुचिता, पूजन सामग्रीका सात्त्विक होना एवं शास्त्रोक्त विधिसे सब मन्त्र पठन होना अति आवश्यक है, तभी कर्मकांड फलीभूत होता है; इसलिए हम हिन्दू जो कर्मकाण्ड करते हैं या करते थे वे शुचिताके पालन हेतु भी कुत्ते या बिल्लीको अपने घरके भीतर नहीं आने देते थे ! धर्मशिक्षणके अभावमें हिन्दुओंको ये शास्त्र सुस्पष्ट रीतिसे नहीं बताया जाता है अतः उससे अनजानेमें ये चूकें उनसे होती हैं ।
 पूजाघरमें कुत्तेके प्रवेशसे कैसे अशुचिता होती है ?, इसका उदहारण सहित विवेचन अगले लेखमें करुंगी । – तनुजा ठाकुर (१३.९.२०१८)



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