क्यों हैं हमारे श्रीगुरु ‘श्रीकृष्ण स्वरुप’ ? (भाग- ९)


‘प्रजारक्षक’ यह भी भगवान श्रीकृष्णका एक नाम हैजैसे श्रीकृष्णके कालमें कंस अपने आतंकसे बृजवासियोंको व्यथित करता था, उनसे मनमाना कर लेता था और श्रीकृष्णके कहनेपर वहांके लोगोंने कंसके विरुद्ध अपने संग्रामका बिगुल फूंका और अन्तत: श्रीकृष्णने कंसका संहार किया । वैसे ही इस निधर्मी लोकतन्त्रमें हमारे श्रीगुरु समाजको संवैधानिक ढंगसे हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाका शंख नाद कर चुके हैं और आनेवाले कालमें दुर्जनोंका अन्त, ईश्वरीय नियोजनके अनुसार तीसरे महायुद्ध, प्राकृतिक आपदाओं एवं भिन्न प्रकारके आतंरिक क्लेशोंसे होगा ही और अन्तत: हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना होगी तथा प्रजा निधर्मी राज्यकर्ताओंके सर्व अत्याचारोंसे मुक्त हो जाएगी ।प्रजारक्षण हेतु हमारे श्रीगुरुने अधिवक्ताओं, चिकित्सकों, हिंदुत्वनिष्ठोंके माध्यमसे स्थूल रक्षण कर रहे हैं एवं अनेक लोग आज धर्माचरण और साधनाके अभावमें प्रजा, सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंके कष्टसे पीडित है; अतः वे स्वयं भी एवं अपने जीवन्मुक्त साधकों, भिन्न सन्तोंके माध्यमसे आध्यात्मिक उपचार बताकर प्रजाका सूक्ष्म जगतकी आसुरी शक्तियोंसे रक्षण कर रहे हैं ।इसप्रकार श्रीकृष्णके भिन्न शास्त्रोंमें कहीं १०८ तो कहीं १००८ नामोंमेंसे अनेक नामोंके अनुरूप उनका चरित्र है, जिसका शब्दबद्ध करना इस तुच्छ जीवके लिए सम्भव नहीं; क्योंकि शास्त्र कहता है ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’ है, ऐसे अनन्त हरि स्वरूपी हमारे श्रीगुरुके श्रीचरणोंमें ये कुछ शब्द रुपी पुष्प समर्पित कर मात्र उनका वन्दन ही कर सकती हूं और उनकी कृपा सदैव बनी रहे, यह प्रार्थना कर सकती हूं !



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