क्यों हैं हमारे श्रीगुरु ‘श्रीकृष्ण स्वरुप’ ? (भाग- ५)


भगवान श्रीकृष्णका एक नाम है जगन्नाथ या जगदीश ।जगन्नाथका अर्थ है जगतके नाथ एवं जगदीशका भी यही अर्थ होता है ।आज विश्वके अनेक साधकोंको उनका आधार प्रतीत होता है इसीलिए वे जगन्नाथ है ।वे सदैव सम्पूर्ण विश्वका विचार करते हैं, उनके साधक एवं सन्त-शिष्य, देशका सीमोल्लंघनकर अनेक देशोंके जिज्ञासु और साधकोंका मार्गदर्शन कर रहे हैं ।भविष्यमें भारतमें हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके पश्चात सम्पूर्ण विश्वमें हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना होगी, ऐसी वे भविष्यवाणी भी कर ही चुके हैं अर्थात वे सम्पूर्ण जगतके हितके कल्याणका विचार कर ही सर्व कृत्य करते हैं; ऐसे द्रष्टा तो मात्र जगन्नाथ ही हो सकते हैं ।जगतके नाथ ही मात्र स्थूल ही नहीं अपितु जड-चेतन एवं स्थूल और सूक्ष्म जगतके सभी जीवोंका विचार करते हैं ।उनके ब्राहम तेजके कारण आज अनेक सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियों(आसुरी शक्तियोंको ) सद्गति मिल रही है ।उन्होंने समाजके लोगोंके अतृप्त पूर्वज जो भिन्न कष्टदायक योनियोंमें कष्ट भोग रहे थे उन्हें सदगति देने हेतु सभीको शास्त्र बताया है ।अर्थात जगतके ये पिता, मात्र अपनी स्थूलसे दिखाई देनेवाली सन्तानोंका ही उद्धार नहीं कर रहे हैं अपितु सूक्ष्म जगतकी आर्त लिंगदेहोंका भी कल्याण कर रहे हैं एवं सभीको उनके कल्याणका उपाय बता रहे हैं ।श्रीगुरु देव दत्तका जप, श्राद्धकी विधिका महत्त्व, सप्त नामजप जैसे अनेक आध्यात्मिक उपचार, इसी क्रमके उदहारण हैं ।



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