क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १०)


निर्गुण ब्रह्मसे एकरूप होनेका सहज साधन है, सगुण ईश्वरका (देवताका) नामजप करना ।
ईश्वर गुप्त हैं; किन्तु उनका नाम सर्वविदित है । नामस्मरणके कारण निर्गुण निराकार ईश्वरको साकार रूपमें प्रकट होना पडता है और इसी सगुण भक्तिकी पराकाष्ठा है, निर्गुण ब्रह्मसे एकरूप होना ! अनेक लोगोंको यह लगता है कि मुक्ति और मोक्ष एक ही है; किन्तु ऐसा नहीं है, जहां मुक्ति ६१% आध्यात्मिक स्तरपर प्राप्त हो जाती है तो वहीं मोक्ष हेतु १०० % आध्यात्मिक स्तर तक मार्गक्रमण करना पडता है और हमारे शास्त्रोंमें मात्र जीवनमुक्त योगी ही मोक्षके अधिकारी होते हैं, इसका उल्लेख किया गया है; जैसे सन्त तुलसीदास कहते हैं –
नाम जीहं जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥ – रामचरितमानस                                              
अर्थ : ब्रह्माके बनाए हुए इस प्रपंचसे (दृश्य जगतसे) भलीभांति छूटे हुए वैराग्यवान मुक्त योगी पुरुष इस नामको ही जीभसे जपते हुए (तत्वज्ञान रूपी दिनमें) जागते हैं और नाम तथा रूपसे रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुखका अनुभव करते हैं ।
भावार्थ : इस चौपाईमें सन्त शिरोमणि तुलसीदासजी भगवानके नामकी गूढ महिमाको बता रहे हैं । प्रभुका नाम जपनेसे साधक मुक्त हो जाता है और ऐसे मुक्त साधक, साधनाके उत्तरोत्तर कालमें नामसे एकरूप हो जाते हैं; परिणामस्वरूप निराकार ब्रह्मकी अनुभूति लेते हैं । अर्थात ईश्वरके सगुण रूपका नाम लेते-लेते साधक निर्गुण ब्रह्मकी ओर प्रवास करता है एवं अन्तत: उसे मोक्षकी प्राप्ति होती है; अतएव नामसे सब कुछ प्राप्त होता है । जो ध्यानमार्गकी कठोर साधनासे (नेत्र बन्द कर चित्तके वृत्तियोंके निरोधसे) प्राप्त होता है, जो ज्ञानमार्गमें गूढ तत्त्वके सूक्ष्म चिन्तनसे प्राप्त होता है, वह भक्तिमार्गसे सहज ही प्राप्त हो जाता है, यही नामकी महिमा है । यद्यपि इस चौपाईमें संत तुलसीदासने भगवान श्रीरामके नामकी महिमा बताई है; किन्तु यह सिद्धान्त ईश्वरके सभी नामोंके साथ लागू होता है; अतः नाम जपें ।



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