क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – ५)


आनेवाले आपातकालकी पूर्वसिद्धता हेतु करें अखण्ड नामस्मरण

आनेवाले भीषणकालमें आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा, आपके धन, ऐश्वर्य या उच्च प्रतिष्ठित लोगोंसे अच्छे सम्बन्ध आपका रक्षण करनेमें असमर्थ होंगे, ऐसेमें मात्र और मात्र भगवान ही आपको सभी प्रकारसे संरक्षण देनेका सामर्थ्य रखते हैं; अतः नामस्मरण करें एवं इसे शीघ्र अति शीघ्र अखण्ड करनेका प्रयास करें ।

जब कौरवोंकी सभामें द्रौपदीका वस्त्र हरण होने लगा और वो सभी ओरसे निराश हो गईं तब उन्होंने भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्णके भिन्न नामोंका स्मरणकर, आर्ततासे आवाहन करते हुए बोला –

गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय ।

कौरवै: परिभूतां मां किं न जानासि केशव ।।

हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन ।

कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन ।।

कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्वात्मन् विश्वभावन ।

प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम् ।।

अर्थ :  हे गोविन्द ! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण ! हे गोपियोंके प्राणबल्लभ ! हे केशव ! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, इस बातको क्या आप नहीं जानते ? हे नाथ ! हे लक्ष्मीनाथ ! हे व्रजनाथ ! हे संकट-नाशन जनार्दन ! मैं कौरवरूप समुद्रमें डूबी जा रही हूं; मेरा उद्धार कीजिए ! हे सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ! महायोगिन् ! विश्वात्मन् ! विश्वभावन ! गोविन्द ! कौरवोंके मध्य कष्टमें पडी हुई मुझ शरणागत अबलाकी रक्षा कीजिए ।’

तब द्रौपदीकी इस करुण प्रार्थनाको सुनकर कृपालु श्रीकृष्ण गद्गद हो गए तथा शय्या व आसन छोडकर दयासे द्रवित धर्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्णने वहां पधारकर अव्यक्तरूपसे द्रौपदीकी लाजका रक्षण किया ।

पांच महावीर एवं अपराजेय पतियोंकी पत्नीको भी आपातकालमें भगवानके संरक्षणकी आवश्यकता पडी, ऐसेमें हमारे ऊपर कितने वीर पुरुषोंका संरक्षण है ?, इसकी कल्पना आप सब स्वयं करें एवं इस तथ्यकी सत्यताको स्वीकारकर ईश्वरके शरणागत हों !



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