क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – २४)


कुछ लोग सांसारिक पद पाने हेतु सतत प्रयत्नशील रहते हैं, जबकि वह क्षणभंगुर होता है । यदि पद पानेका ही कोई अभिलाषी है तो उसने शाश्वत पद पानेका प्रयास करना चाहिए । साधना कर आत्मप्रकाशी बनकर, व्यक्ति शाश्वत पदका अधिकारी बन जाता है, इतना ही नहीं, वह सुख-दुःखके चक्रव्यूहसे भी ऊपर उठ जाता है एवं सर्वज्ञताके बोधसे वह विनम्र बन जाता है । इन सबको प्राप्त करनेका एक सरल माध्यम नामजप है । ईश्वरके नाममें उनका ज्ञान समाहित होता है; अतः नामधारक चाहे लौकिक दृष्टिसे अशिक्षित हो, लोकाचारसे अनभिज्ञ हो, आध्यात्मिक दृष्टिसे वह सर्वज्ञ हो सकता है, यह नामकी विशेषता है । वैसे ही ईश्वरके नाममें यश रुपी गुण समाहित होता है; अतः इसे जपनेवाला और इससे एकरूप हो जानेवाला जीव अनन्त कालतक यश प्राप्त करता है । प्रत्येक वर्ष अनेक चिकित्सक, अभियंता, खिलाडी, अधिकारी, कलाकार, राजनेता इत्यादि प्रसिद्धिको प्राप्त करते हैं; किन्तु उनका यश क्षणिक होता है और कुछ वर्षों पश्चात उनका सभीको विस्मरण हो जाता है, इसके विपरीत भक्तका यशगान सदैव किया जाता है अर्थात उसे शाश्वत यशकी प्राप्ति होती है ।

अनेक व्यक्ति सांसारिक ज्ञानके किसी एक विषय या क्षेत्र या कुछ विषयोंमें पारंगत होकर या पदवी प्राप्त कर ज्ञानी बनते हैं; किन्तु नामस्मरणके कारण ईश्वरसे एकरूप भक्त, अध्यात्म और धर्मका ज्ञाता बनकर सर्वत्र और सर्वकाल पूजे जाते हैं । महर्षि व्यास, वाल्मीकि, अगस्त्य, दधिचि, भारद्वाज जैसे अनेक अति प्राचीन सन्तवृन्द इसके उदाहरण हैं । यह सब नामकी ही महिमा है । गरुड पुराणमें भी बताया गया है –

यदीच्छसि परं ज्ञानं ज्ञानाच्च परमं पदम् ।

तदा यत्नेन  महता कुरु श्रीहरिकीर्तनम् ।।

अर्थ : यदि परम ज्ञान अर्थात आत्मज्ञानकी इच्छा है और आत्मज्ञानसे परम पद पानेकी इच्छा है तो खूब यत्नपूर्वक श्रीहरिके नामका कीर्तन करो ।



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