कलियुगमें तमोगुणका साम्राज्य होता है, इसकारण अनेक बार ध्यानमार्गी, ज्ञानमार्गी एवं कर्मयोगसे साधना करनेवाले जीवकी बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है और वह योगभ्रष्ट या पथभ्रष्ट हो जाता है । कलिके इस प्रभावसे बचने हेतु आप जिस भी योगमार्गसे साधना करते हों, उस साधनाको नामस्मरणसे जोड दें, इससे साधनामें अखण्डता बनी रहेगी एवं ईश्वरसे अनुसन्धान बना रहेगा ।
एक बार नारदजीने ब्रह्माजीसे कहा, “ऐसा कोई उपाय बताइए, जिससे मैं विकराल कलिकालके काल जालमें न फंस सकूं ।”
इसके उत्तरमें ब्रह्माजीने कहाने कहा,
‘आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूत कलिर्भवति ।’
अर्थ : ‘आदि पुरुष भगवान नारायणके नामोच्चार करने मात्रसे ही मनुष्य कलिसे तर जाता है अर्थात कलि नामस्मरण करनेवालेका कुछ भी नहीं बिगाड सकता है ।’ इसीलिए साधक किसी भी योगमार्गसे साधना करे तो भी नामस्मरण अवश्य करना चाहिए और निरन्तर प्रयाससे यह अखण्ड हो जाता है, जिससे सभी योगमार्गके साधकोंको लाभ मिलता है ।
जैसे ज्ञानमार्गीका विवेक सदैव जागृत रहता है और अखण्ड नामस्मरणके कारण वह सर्वत्र एवं सदैव ब्रह्म तत्त्वकी अनुभूति ले सकता है । ध्यानमार्गी भी यदि सदैव नामस्मरण करे तो उसके चित्तके संस्कार न्यून होते हैं, जिससे ध्यानाभ्यास करते समय मन सहज ही एकाग्र होता है और मन समाधिकी अवस्थाकी ओर बढने लगता है, वस्तुत: ‘पश्यन्ति वाणी’में अखण्ड नामस्मरण आरम्भ होनेपर ‘जागृत समाधि’की अवस्थाकी ओर जीव अग्रसर होता है । कर्मयोगी भी यदि अखण्ड नामस्मरण करे तो उसके सर्व कर्म, अकर्म होते हैं और वह निरपेक्ष भावसे ईश्वरेच्छा मानकर सर्व कर्म करता है, जो कर्मयोगका मुख्य उद्देश्य होता है । इसप्रकार नामजप किसी भी योगमार्गसे साधना करनेवाले साधकके लिए एक उत्प्रेरकका (catalyst) कार्य करता है; अतः अखण्ड नामस्मरण करनेका प्रयास करें ।
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