क्यों सीखें संस्कृत (भाग – १२)


कई लोग अज्ञानवश इस भाषाको पूजा-पाठ, कर्मकाण्डसे जुडा और अपने लिए अनुपयोगी समझते हैं; किन्तु इसका केवल पांच-सात प्रतिशत साहित्य ही इसप्रकारका है । वस्तुत: इस भाषाके अन्तर्गत सुरक्षित षड्दर्शनोंको जाने बिना हम उस चिन्तन तक नहीं पहुंच सकते, जो भारत देशकी संस्कृतिका मूल आधार एवं हमारे परम कल्याणका साधन है । यह कहना अनुचित नहीं होगा कि संस्कृत वाङमय अनादि कालसे भारतीय सभ्यताका एक सजीव और मूर्त रूप है । यह भाषा ‘किसी न किसी’ रूपमें सम्पूर्ण भारतके सभी क्षेत्रोंके लोगोंके जीवनमें महत्वपूर्ण और पावन क्षणोंमें उपस्थित रहती है । यह अन्दरसे बिना प्रकट हुए सबको एक सूत्रमें पिरोनेका कार्य करती है और ज्ञानके आलोकसे सबको प्रकाशित करती है । यह हम सबकी एक साझी विरासत है और इस अर्थमें अत्यन्त व्यापक है कि यह प्रान्तीयता या क्षेत्रीयताकी परिधिसे पार जाती है । इसमें इतिहासका पश्चिमी मोह नहीं है और देश कालका अतिक्रमण कर सबका समावेश कर पानेकी क्षमता विद्यमान है । इसके क्षेत्र व्यापक हैं और यह साहित्य, पर्यावरण, शिक्षा, ज्ञान तथा मानव गरिमाकी रक्षा करनेके लिए तत्पर है; इसलिए इस भाषाको अवश्य ही सीखना चाहिए ।



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