जो भी स्त्री लोक-लाजका त्याग कर अंग प्रदर्शन कर अन्योंमें वासनाको जागृत करती हैं, वे महापापकी अधिकारिणी होती हैं । स्त्रियोंका नैसर्गिक अलंकार उनकी स्त्री-सुलभ लज्जा है, यदि वह समाप्त हो गया, तो समझ लें सब कुछ समाप्त हो गया ! पिछले कुछ दशकोंका इतिहास साक्षी है, अधिकांश अंग-प्रदर्शन करनेवाली चलचित्र एवं मॉडलिंग जगतकी भारतीय एवं विदेशकी प्रसिद्ध स्त्री कलाकारोंका व्यावहारिक जीवन, धन-सम्पत्ति और तथाकथित प्रतिष्ठा होनेपर भी क्लेशप्रद, अस्थिर एवं शारीरिक तथा मानसिक कष्टयुक्त रहा है । कुछने तो आत्महत्या भी की है और अनेक मद्यपान और अन्य प्रकारके व्यसनकी भेंट चढ गईं हैं और कुछकी मृत्युका समाचार तो उनके पडोसियोंको उनके शवके सडनेकी दुर्गन्धसे प्राप्त हुआ है; अतः अंग प्रदर्शन करनेवाली स्त्रियां, समाजकी आदर्श नहीं हो सकती हैं और न ही उन्हें ‘बोल्ड’ कहा जा सकता है । वे तो वस्तुत: ओछी लोकप्रियताकी प्रेमी एवं मनोरोगी या विक्षिप्त होती हैं; क्योंकि स्त्री तो कभी सबके समक्ष अर्धनग्न होना ही नहीं चाहती है, यह उसके मूल प्रकृतिके विरुद्ध है !
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