लेखनके शब्द ईश्वरद्वारा प्रेरित


हमारे लेखोंके कुछ पाठक या साधक मुझसे कहते हैं कि कुछ लोग आपके लेखोंको अपने नामसे अन्य गुटमें ‘पोस्ट’ कर रहे हैं, मैंने कहा, “कोई बात नहीं है, वह मेरे लेखोंको अपने नामसे डालकर मात्र अपने अहंकारकी पुष्टि कर रहे हैं, शेष कुछ नहीं; क्योंकि शास्त्र कहता है –
न चोराहार्यम् न च राजहार्यम्  न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं  विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
अर्थ : जिसे न चोर चुरा सकते हैं, न राजा हरण कर सकता है, न भाइयोंमें बांटा जा सकता है, जो न भार स्वरुप ही है, जो नित्य व्यय करनेपर भी बढता है, ऐसा विद्यारूपी धन सभी धनोंमें प्रधान है ।
अन्तरात्मासे उपजनेवाली विद्याको कभी चुराया नहीं जा सकता है, वह तो अमृतधारा समान अविरल बहती है, उसके प्रवाहकी कुछ बूंदोंंको कोई अपना नाम दे दे तो उससे मुझे कोई हानि होनेवाली नहीं है; क्योंकि वह मेरी है ही नहीं !  
   सत्य तो यह है कि अब शरीरसे स्वस्थ न रहनेके कारण, भ्रमणकर प्रसार करना मेरे लिए कठिन है; अतः ईश्वर, गुरु और सन्तोंकी आज्ञा मानकर लिखती हूं या ऐसा कहना ठीक होगा कि वे लिखवाते हैं !; इसलिए यह चोरी अधिक समयतक कोई नहीं कर सकता है ! विद्यासे अर्जित ज्ञान मात्र विनम्रता, अकर्तापन एवं ईश्वरीय कृपासे ही आ सकता है ! चोरी करके भी कभी कोई ज्ञानी या पण्डित नहीं बना है !
 और चोरी तो बहुमूल्य वस्तुओंकी ही होती है; अतः कोई यदि मेरे लेखोंकी चोरी कर रहा है तो निश्चित ही इसका महत्त्व होगा, इससे भी यह सिद्ध होता है कि यह ईश्वरद्वारा प्रेरित सन्देश है; अतः इससे भी वह व्यक्ति किसीका भला ही कर रहा है, यद्यपि इससे उसके अपने अहंकी पुष्टि होती है; अतः जहां इस सन्देशके प्रसारित होनेसे समष्टि कल्याण होता है, वहीं व्यष्टि स्तरपर उसे हानि होती है और वह पापका अधिकारी होता है ! अहंकारके कारण ऐसे लोगोंको मृत्यु उपरान्त ब्रह्मराक्षसकी योनि प्राप्त होती है !
मैं तो सदैव ही कहती हूं कि मैं विदुषी नहीं हूं, न ही कोई ज्ञानी हूं, ईश्वर और गुरुने शब्द और शब्दातीत माध्यमसे जो भी सिखाया, वह उनकी आज्ञा मानकर उसे शब्दबद्ध करनेका प्रयास कर रही हूं, वस्तुतः इसमें कुछ नूतन नहीं, सत्य तो शाश्वत है, उसे मात्र शब्दोंकी रचना और उदाहरणोंके माध्यमसे थोडा परिवर्तनकर लिखा जा सकता है, सार सदैव वही होगा, जो हमारे ऋषियोंने सृष्टिके आदिकालमें ही बताया है ! यदि मैंं यह लेखनकी सेवा नहीं कर पाती तो मुझे सदैव यह ग्लानि होती कि अस्वस्थ होनेके कारण मुझसे कोई समष्टि सेवा नहीं हो पाती है । मैंने अपने श्रीगुरुको पूर्णकालिक साधक बनते समय ही सूक्ष्मसे वचन दिया था कि अपनी अन्तिम सांसके चलनेतक मेरा जीवन मात्र उनके कार्यको समर्पित रहेगा, मैं इस ग्लानिसे ग्रस्त न होऊं; इसलिए यह सब ईश्वरने नियोजित किया है ! और मेरे अस्वस्थ होनेका कारण भी ईश्वरको ज्ञात है, मेरे अधिकांश कष्ट आध्यात्मिक हैं एवं समष्टि कष्टका प्रमाण ७५ % है ! ऐसेमें वे मेरी नित्य नूतन विधिसे सहायता करते रहते हैं, जिससे मेरी समष्टि सेवा हो ! आज हमारी संस्थाके पास सीमित साधन होते हुए भी अनेक लोग हमसे किसी न किसी माध्यमसे जुडकर राष्ट्र और धर्मसे सम्बन्धित कुछ बातें सीख पा रहे हैं, उसे आचरणमें ला पा रहे हैं ! इसे तो मैं मात्र ईश्वरीय कृपा एवं नियोजन मानती हूं और इसके लिए मैं सदैव ही उस परम सत्ताके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती रहती हूं ! मुझे ज्ञात है कि कुछ लोग मेरे लेखोंको अपने नामसे प्रकाशित या प्रसारित कर रहे हैं; क्योंकि आजके अधिकांश लोगोंमें चिंतन करनेकी क्षमता ही नहीं है, लेखनकी बात तो बहुत आगेकी है ! मैं भी सामाजिक प्रसार माध्यमपर (सोशल मीडियापर) गत (पिछले) ११ वर्षोंंसे हूं और मैंने पाया है कि १ % व्यक्तिके भी लेख पठनीय नहीं होते हैं !; अतः गुरु बननेके इच्छुक व्यक्तियोंके पास विषयको ‘कॉपी’ करनेके अतिरिक्त और कोई पर्याय ही नहीं होता है !
कुछ दिवस पूर्व ही इन्दौरके एक सुप्रसिद्ध विद्वान व्यक्तिने हमारी संस्थाद्वारा प्रकशित पत्रिका ‘वैदिक उपासना’को पढनेके पश्चात मुझसे दूरभाषपर कहा, “मैं आपके सभी पाठकोंकी ओरसे बात कर रहा हूं; क्योंकि मेरे समान सब आपको अपनी भावनाओंको आपसे व्यक्त नहीं कर पाते होंगे; अतः आपको मेरी बातें सुननी होंगी !” और वे आधे घंटेतक, उस पत्रिकामें छपनेवाले लेखों एवं उसकी प्रस्तुतिके विषयमें स्तुति करते रहे ! (आपको बता दें, मैं जो प्रतिदिन लिखती हूं, उसे पत्रिकामें अन्य आवश्यक लेखोंके साथ संकलित कर देती हूं) । ऐसे प्रसंग भी ईश्वरद्वारा ही निर्मित होते हैं, ईश्वर ही भिन्न माध्यमोंसे सिखाते हैं, गणेशजी उसे लिखनेकी सद्बुद्धि देते हैं, मां सरस्वती उसे लिखवाती हैं एवं हमारे श्रीगुरु एवं कुछ विद्वतजन उसकी स्तुति करते हैं, इस पूरी प्रक्रियामें मैं तो कहीं हूं ही नहीं ! जो मैंने नहीं लिखा, उसकी स्तुतिपर अहंकार कैसा और उसकी चोरी होनेपर विषाद कैसा ? यहां तो सर्वत्र ब्रह्म ही ब्रह्म है !
अकर्तापनके भावसे एवं बिना फलकी अपेक्षासे कर्म करना, यह मेरा धर्म है और वही मैं कर रही हूं !


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