मान-सम्मान पानेकी कुञ्जी क्या है ?


आजका गृहस्थ अत्यन्त स्वार्थी हो गया है, उसके पास देव, पितर, समाज किसीके लिए भी समय नहीं होता; परिणामस्वरूप उसका जीवन अत्यधिक वैज्ञानिक सुख-संसाधन होते हुए भी रोग और शोकसे ग्रसित है । सुखी जीवनकी कुञ्जी बताते हुए महात्मा विदुर कहते हैं –

पंचैव पूजयन् लोके यश: प्राप्नोति केवलं ।
देवान् पितॄन् मनुष्यांश्च भिक्षून् अतिथि पंचमान्  ॥ – विदुर नीति   

अर्थात देवता, पितर, मनुष्य, भिक्षुक (सन्त एवं संन्यासी, जो भिक्षाके सहारे जीवनयापन कर साधना करते हैं) तथा अतिथि, इन पांचोंकी सदैव सच्चे मनसे पूजा-स्तुति (मान-सम्मान) करनी चाहिए । इससे यश और सम्मान प्राप्त होता है । आजका सर्वसामान्य गृहस्थ इन सबकी अवहेलना करता है; अतः उनके जीवनके प्रत्येक क्षेत्रमें अपयश मिलता है, जिससे उनका क्लेशयुक्त हो जाता है ।



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