साधककी मनःशुद्धि आवश्यक !


प्रथमं मनस:  शुद्धि: कर्तव्या शुभमिच्छता ।

शुद्धे मनसि द्रव्यस्य शुद्धिर्भवति नान्यथा ॥

अर्थ: कल्याणकी कामना करनेवाले पुरषको सर्वप्रथम अपने मनको शुद्ध कर लेना चाहिए । मनके शुद्ध हो जानेपर द्रव्यशुद्धि स्वतः हो जाती है । इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है ।

भावार्थ : समाज कल्याण करनेवालोंके लिए यह सुवचन अत्यंत सुंदर सन्देश देती है । जो दूसरोंका कल्याण करनेका विचार करते हैं, उन्होंने साधनाकर अपनी इन्द्रियोंपर नियंत्रण साध्य करना चाहिए; क्योंकि मनको शुद्ध करनेका एक ही पर्याय है और वह है ‘साधना’ । किसी भी योगमार्गके माध्यमसे साधनाकर चित्तके अशुद्ध संस्कारोंका नियमन करनेसे ईश्वरीय अनुसंधान साध्य होने लगता है और एक बार यह साध्य हो जाए तो मनुष्य अधर्म कर ही नहीं सकता है; क्योंकि उसकी सर्व कृति ईश्वर प्रेरित होती है एवं जब वह व्यक्ति समाज कल्याण हेतु किसी भी वस्तुको स्पर्श करता है तो उसके चैतन्यसे वह भारित हो जानेके कारण वह भी शुद्ध हो जाता है । वह सर्वत्र नारायणके स्वरूपका दर्शनकर सेवा करता है; अतः उसके कर्म, अकर्म कर्म होनेसे उन कर्मोंसे कोई फल निर्मित नहीं होता और वह आनन्दकी अनुभूति लेते हुए मायामें भी अनासक्त होकर कर्मरत रहता है ।



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