मंदिरमें प्रेमसे एवं निरपेक्ष भावसे सेवा करने के लाभ !


इस बारकी साधना शिविरमें एक दम्पति हरियाणासे आए थे  । उनका सुपुत्र उपासनाके मार्गदर्शनमें पूर्ण निष्ठा एवं सातत्यसे साधना करता है  । इस साधकके पिताजीको अनिष्ट शक्तियोंका तीव्र कष्ट है, इसी कष्टके परिणामस्वरुप उनका अच्छा चलता व्यापार बंद हो गया, उन्हें मानसिक कष्ट भी है  । किन्तु मैंने देखा कि वे बहुत ही प्रेम और श्रद्धासे चार दिवस सेवा करते रहे  । अभी तक ऐसा बहुत ही कम हुआ है कि जिन्हें इतना कष्ट हो वे आतेके साथ श्रद्धासे सेवा करने लगे  । बात ही बातमें उन्होंने बताया कि उनके सुपुत्रने उन्हें घरके पास ही नाथ सम्प्रदायके किसी सन्तद्वारा स्थापित एवं जीर्ण अवस्थाके हनुमान मंदिरमें नित्य स्वच्छता कर, दो घंटे नामजप करनेके लिए कहा था  । और यह वे कुछ समयसे नियमित कर रहे हैं  । मुझे समझमें आ गया कि इतना कष्ट होते हुए भी ये महोदय आश्रममें सहज होकर सेवा कैसे कर रहे हैं ? सामान्यत: जिन्हें अनिष्ट शक्तियोंका अधिक कष्ट होता है, उनके आश्रम आते ही यहांके सात्त्विक वातवरणसे उन्हें कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्तियोंको कष्ट होने लगता है और उन्हें या तो तीव्र शारीरिक कष्ट होता है और यदि वे मानसिक रूपसे पहलेसे कष्टमें होते हैं अर्थात उन्हें किसीप्रकारका मनोविकार होता है तो उन्हें त्वरित आश्रमसे जानेका विचार आने लगता है  । यह मैं पिछले छ: वर्षोंसे लगातार अनुभव कर रही हूं  । किन्तु इन महोदयने भावसे जो सेवा मंदिर स्वच्छताकी की और वहीं बैठकर नामजप भी किया इसकारण हनुमानजीने उनके कष्टको न्यून किया है और वे आश्रममें आकर साधना सीखकर गए हैं । इस प्रसंगसे मैं यह बताना चाहती हूं कि यदि किसीको अनिष्ट शक्तियोंका तीव्र कष्ट हो और उनके लिए किसी सन्तके या अपने गुरुके आश्रममें जाकर सेवा करनेकी सन्धि नहीं मिल पाती हो या किसी विवशताके कारण नहीं जा पाते हों तो निकटके मंदिरमें प्रेमसे एवं निरपेक्ष भावसे जो सम्भव हो वह सेवा करे तो निश्चित ही ईश्वर उनको अगले चरणमें ले जायेंगे ! मुझे भी उस साधकके  माता-पिताको आश्रममें बुलानेका ईश्वरसे निर्देश प्राप्त हुआ था  । उनके आनेके पश्चात उसका कारण ज्ञात हुआ !    



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