मनोचिकित्सककी सहायता लेनेमें संकोच न करें !


साधको, जैसे शरीरके रुग्ण होनेपर हम चिकित्सकोंके पास जाते हैं, वैसे ही मन यदि सामान्य रूपसे वर्तन न कर रहा हो या वह आपके वशमें अधिकांश समय न रहता हो तो कृपया मनोचिकित्सककी सहायता लेनेमें संकोच न करें । हमारे यहां मनोचिकित्सककी अवधारणा इसलिए इतनी प्रचलित नहीं है; क्योंकि यह समाज सदैव ही धर्मनिष्ठ, ईश्वरनिष्ठ एवं साधनानिष्ठ रहा है । व्यक्तिकी जितना अधिक धर्मनिष्ठा होता है, उसकी साधना उतनी ही प्रगल्भ होती है और ऐसे लोगोंमें षड्रिपु एवं अहंका प्रमाण भी अत्यधिक न्यून रहता है; इसलिए ऐसे लोगोंको अधिक मानसिक रोग या कष्ट नहीं होते हैं; किन्तु एक सहस्र वर्षसे भारतके हिन्दुओंने धर्माचरण एवं साधना दोनों ही लगभग त्यागसे दिए हैं । आज धर्म और साधना निरपेक्ष भावसे करनेवाले लोगोंकी संख्या मात्र ५ % है; परिणामस्वरूप अधिकांश लोगोंमें रज-तमका प्रमाण अधिक होनेके कारण उनमें दोष और अहंकार दोनोंका प्रमाण अधिक होता है, जो मूल रूपसे भिन्न प्रकारके मानसिक रोगोंके लिए कारणीभूत होते हैं; इसलिए ऐसी स्थितिमें मनोचिकित्सककी सहायता लेनेमें कोई लज्जा नहीं करनी चाहिए ! मनोचिकित्सक क्या करता है ?, वह आपको मानसिक स्तरपर आपके दोष और अहंका भान कराता है और जब आप इसे स्वीकार कर दूर करनेका प्रयास करने लगते हैं तो अध्यात्म आपकी सहायता करता है, अन्यथा अनेक साधकोंकी साधना, मनोरोग दूर करनेमें व्यय हो जाती है एवं कुछ तो एक ही अध्यात्मिक स्तरपर अटके रहते हैं या कुछ अपनी कुछ दोषोंके कारण गिर भी जाते हैं; इसलिए योग्य समस्याके योग्य निदान करनेका यथोचित प्रयास करें !
यदि आप सातत्यसे निर्विकल्प होकर साधना कर पा रहे हैं और दोष व अहं निर्मूलन कर पा रहे हैं तो भी इससे आपके दोष और अहं न्यून होनेपर आपके मनोरोग दूर हो जाएंगें; किन्तु यदि आप सब कुछ जानकर भी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो किसी मनोचिकित्सककी  सहायता लेनेमें संकोच न करें, वे आपके मनको समझकर आपकी सहायता करेंगें ।



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