मांसाहार क्यों न करें ? (भाग – १०)


जब पशु पशुवधगृहमें (बूचडखानेमें) कसाईके द्वारा अपनी मृत्युको पास आते देखता है तो वह भय और आतंकसे कांप उठता है । मृत्युको समीप भांपकर वह एक-दो दिन पहलेसे ही खाना पीना छोड देता है । वैसे ही मृत्युसे पूर्व निःसहाय पशु आत्मरक्षाके लिए पुरुषार्थ करता है, छटपटाता है । पुरुषार्थ व्यर्थ होनेपर उसका भय और आक्रोश बढ जाता है, क्रोधमें आंखे लाल हो जाती हैं, मुखमें झाग आ जाते हैं । ऐसी अवस्थामें उसके भीतर एक पदार्थ ‘एडरीनालिन’ (Adrenalin) उत्पन्न होता है जो उसके रक्तचापको बढा देता है व उसके मांसको विषैला बना देता है । जब मनुष्य वह मांस खाता है तो उसमें भी ‘एडरीनालिन’ प्रवेशकर घातक रोगोंको उत्पन्न करनेकी आशंकाको जन्म देता है। ‘एडरीनालिन’के साथ जब ‘क्लोरिनेटेड हाइड्रोकार्बन’ लिया जाता है तब तो ये हृदय आघातका (हार्ट अटैकका) गंभीरतम संकट उत्पन्न कर देते हैं । मांसमें रक्त, वीर्य, मूत्र, मल आदि अन्य कितनी ही घटकोंका अंश होता है । इसलिए इसे तमोगुणी आहार कहा गया है ।


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