मांसाहार क्यों न करें ? (भाग – १५)


मांस खानेवाले प्राणियोंकी आंतोंसे मनुष्य और अन्य शाकाहारी प्राणियोंकी आंतें छोटी होती हैं । मांसाहारी प्राणियोंकी आंतें लम्बी होती हैं। वह मांसाहारी प्राणियोंके पाचन तंत्रमें इसीलिए पच जाता है। शाकाहारी प्राणियोंकी आंतोंमें वह पचे बिना रह जाता है।

बिना पचा आहार हानिकारक सिद्ध होता है। जिन्होंने मानव शरीर शास्त्रका गहन अध्ययन किया है, उनका निष्कर्ष है कि स्वास्थ्यकी दृष्टिसे मांसाहार विपरीत प्रभाव देता है। हेंगका कहना है कि ‘शाकाहार ही शक्ति उत्पन्न करता है । मांससे केवल उत्तेजना बढती है ।

शोधकर्ता मेनरी पडरीने लिखा है – शाकाहारियोंकी तुलनामें मांसाहारी अधिक रुग्न होते हैं और उनकी आयु भी अपेक्षाकृत कम होती है । डाक्टर पारकरने कहा है, ‘सिरदर्द, अपच, गठिया, थकान, रक्तचाप, मधुमेह आदिका कारण यूरोप, अमेरिकामें बढा हुआ मांसाहार ही है । यदि मांसाहार बन्द कर दिया जाए तो विश्वकी आधी बीमारियां स्वत: ठीक हो जाएंगी । डाक्टर एन. चर्चितने सिद्ध किया है कि मांसमें जो प्रोटीन पाया जाता है वह प्रोटीन इतना घटिया होता है जिससे हानिकी बहुत अधिक संभावनाएं होती हैं । प्रोफेसर वेज्जका मानना है कि मनुष्यकी प्रकृति में क्रोध, उद्दण्डता, आवेश, अविवेक, कामुकता और अपराधी प्रवृति उत्पन्न करने तथा भडकानेमें मांसाहारका बहुत बडा हाथ है । धार्मिक दृष्टिसे तो इसे सदा निन्दनीय पाप कर्म बताया जाता रहा है । हिन्दू धर्ममें तो इसे तामसिक आहार कहा गया है; अतः इससे तामसिक गुणोंमें कालान्तरमें वृद्धि होना स्वाभाविक है ! विशेषकर कलियुगी जीवकी प्रकृति भोगी है, ऐसेमें इसप्रकारका आहार उनके लिए विषका कार्य करता है |



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