मार्गदर्शक सदैव योग्य व शास्त्रसम्मत आचरण करें !


कुछ धर्मगुरु या मार्गदर्शक अपने भक्तोंके आग्रहपर पाश्चात्य संस्कृतिका अनुकरण करते हैं ।  जैसे एक धर्मगुरुके जन्मदिनके कार्यक्रममें मुझे आमन्त्रित किया गया था । उनके कार्यक्रममें एक भक्त केक बनाकर लाया था, जिसे मंचपर लाया गया और उन्हें उसे छूरीसे काटने हेतु भी भक्तोंद्वारा आग्रह किया गया । उन्होंने उसे नहीं काटा (यह योग्य कृति थी); किन्तु उसे, उन्हें सबके समक्ष खिलाया गया और महाप्रसादमें उसे भक्तोंको बांटा गया ।  भक्त, अपने मार्गदर्शकका अनुकरण करते हैं; इसलिए धर्मगुरु या मार्गदर्शकके प्रत्येक कृत्य आदर्श एवं वैदिक संस्कृति अनुकूल होने चाहिए, इस बातका समष्टि साधना करनेवाले मार्गदर्शकोंने विशेष रूपसे ध्यान रखना चाहिए । कहांपर परेच्छाका पालन होना चाहिए और कहांपर नहीं ?, इसके पालन हेतु विवेकका उपयोग करना, धर्मगुरुओं एवं मार्गदर्शकोंके लिए अति आवश्यक है ।

   आजका हिन्दू समाज तो दिशाहीन है और आजके तमोगुणी धर्माभिमानशून्य समाजको पाश्चात्योंके प्रत्येक कृत्य अच्छे लगते हैं । उनका मन न दुखे, इसलिए मार्गदर्शकद्वारा उनकी बताई अवैदिक  बातोंका पालन करना पूर्णत: अनुचित है ! जैसे मां बच्चोंकी अनुचित बातोंको नहीं मानती है और उसके लिए जो योग्य है वही करती या करवाती है, उसीप्रकार धर्मगुरु या मार्गदर्शकने भावनामें बहकर ऐसा कुछ कभी नहीं करना चाहिए, जिससे समाजमें अनुचित तथ्योंका पालन आरम्भ हो जाए । भक्तके भावमें बहकर उनकी बातोंको तभी तक मानना उचित होता है, जबतक उनकी बातें धर्म अधिष्ठित हों, अन्यथा मार्गदर्शक भी पापके भागी बनते हैं; अपितु अधिक पापके भागी बनते हैं; क्योंकि वे समाजको दिशाहीन करते हैं !



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