मन्दिर जानेवाली महिलाओंको यौन-वासनाकी इच्छुक बतानेवाले उपन्यास ‘मीशा’को किया गया पुरस्कृत


१८ फरवरी, २०२१
     केरलके साहित्य अकादमीने ‘मीशा’ उपन्यासको पुरस्कृत किया है । यह उपन्यास हिन्दू महिलाओंके चरित्रको दूषित दर्शाता है । ‘द जेमिनियन’ नामक ‘ट्विटर’ने उपन्यासकी इस दुष्कृतिको प्रस्तुत कर बताया है । दो मित्रोंके मध्य काल्पनिक वार्ताको आधार बनाकर, उपन्यासमें यह अपमान प्रस्तुत किया गया है कि किस प्रकार हिन्दू महिलाएं सुन्दर वस्त्र धारणकर मन्दिरके पुजारीको यह बताना चाहती हैं कि वे यौन-वासनाके लिए उद्यत हैं ।
      सर्वोच्च न्यायालयमें इसके विरुद्ध चुनौती दी गई थी कि उपन्यासमें हिन्दू-धर्म और पुजारियोंका अपमान किया गया है; किन्तु न्यायाधीश दीपक मिश्राकी अध्यक्षतामें न्यायालयने इसपर प्रतिबन्ध लगानेसे मना कर दिया और इसे अभिव्यक्तिकी स्वतन्त्रता बता दिया गया ।
       प्रथम बार यह मलयालम साप्ताहिक ‘मातृभूमि’में प्रकाशित किया गया था; किन्तु तीन सप्ताह पश्चात इसे बन्द कर दिया गया था । पुनः ‘डीसी बुक्स’द्वारा इसे पुस्तकके रूपमें प्रकाशित किया गया । मन्दिर जानेवाली महिलाओंद्वारा इसका बहुत विरोध किया गया था ।
      केरलके भाजपा प्रमुख सुरेन्द्रने इसकी निन्दा करते हुए कहा है कि सबरीमालाके पश्चात हिन्दुओंके अपमानका यह अब क्रम बन गया है ।
       जिस भारत भूमिपर नारीको देवीके रूपमें माना जाता था, अब वहींपर कुछ दूषित वृतिके लेखकोंद्वारा उसे अपमानित किया जा रहा है और न्यायालयद्वारा भी धर्म विरोधियोंको प्रोत्साहित किया जा रहा है । ऐसे लेखकोंको शासनद्वारा दण्डित किया जाना चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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